क्या हिंदुस्तान में आम आदमी की जान बहुत सस्ती है? आज दो तस्वीरें हम आपको दिखाने वाले हैं और फर्क आप बताइएगा। पहली तस्वीर पुर्तगाल की है जहां पर एक गर्भवती महिला को अस्पताल में उसके होने वाले बच्चे के लिए एनआईसीयू का बेड तक नहीं मिलता। दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करते वक्त रास्ते में उसे कार्डियक अरेस्ट आता है और कुछ दिन बाद उसकी मौत हो जाती है। खबर फैलते ही देश उबल पड़ता है। मौत की खबर आने के 5 घंटे के अंदर देश के हेल्थ मिनिस्टर को इस्तीफा देना पड़ता है। केवल 5 घंटे में इस्तीफा। इधर दूसरी तरफ हिंदुस्तान में दिल्ली में देश की राजधानी जहां प्रधानमंत्री रहते हैं, जहां देश की संसद है, सुप्रीम कोर्ट है, वहां पर एक सरकारी अस्पताल के बाहर एक महिला की खड़े-खड़े डिलीवरी होती है। वजह अंदर बेड नहीं था। इंदौर वहां के एक अस्पताल में एक नवजात बच्चे को चूहे कुतर कुतर कर खा जाते हैं। और इस्तीफा छोड़िए। हमारे देश के अखबार तीसरे चौथे पांचवे पन्ने तक इस खबर को कवर तक नहीं करते। उधर पुर्तगाल में जिस महिला की मौत पर मिनिस्टर कुर्सी गई थी आपको जान के हैरानी होगी। वो महिला पुर्तगाल की नहीं थी। वो हमारे देश हिंदुस्तान की थी। यानी एक भारतीय की जान की कीमत पुर्तगाल में इतनी है कि वहां के हेल्थ मिनिस्टर का 5 घंटे में इस्तीफा हो जाता है। और हिंदुस्तान के अंदर आपके बच्चे को चूहा नोच जाए। आप ठंड में मर जाए। आपकी जान की कोई फिक्र नहीं है। अब सवाल यह नहीं है कि वहां सिस्टम अच्छा क्यों है? सवाल यह है कि आजादी के इतने सालों बाद जब कांग्रेस से लेकर बीजेपी की कई बार की सरकार रही तो हमारा सिस्टम ऐसा बनकर क्यों रह गया? क्यों ऐसा हुआ कि हमारे देश में नेता मंत्री अस्पताल वाले वो तो अमीर हो गए। हमारी आपकी बदहाली से उनकी तिजोरियां भर गई। लेकिन हम और आप आज भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पाए। आपको जानकर हैरानी होगी कि हर साल करीब ₹ लाख करोड़ रुपए हमारी जेब से निकल कर जाते हैं हेल्थ के नाम पर और जिस नाम से ये ट्रांसफर होते हैं वो है
ओपीई चार शब्दों का लेटर ये चार शब्द जिन्हें सरकार का अपना थिंक टैंक नीति आयोग मानता है। वो मानता है कि इस देश में हर साल करीब 10 करोड़ लोग इलाज करातेकराते गरीबी में धकेल दिए जाते हैं। हर साल और 10 करोड़ को ये समझिए कि पूरी जर्मनी जितनी आबादी हिंदुस्तान में इसलिए गरीब हो जाती है क्योंकि हम और आप अपना एक बड़ा हिस्सा हेल्थ पर खर्च करते हैं। मतलब एक कागज का टुकड़ा जो आपकी अलमारी में पड़ा है, उसका बिल आपका स्टेटस चेंज कर देता है कि आप मिडिल क्लास से अब गरीब हो गए। अब आपके मन में सवाल होगा कि ये क्यों? कैसे किस लिए? आज इसी पर हम बात करेंगे। आज भारत के हेल्थ सिस्टम को हम पूरी तरह से एक्सपोज करने वाले हैं और हम चाहते हैं कि इस वीडियो को आप सुने, समझे, जाने, हमारा साथ दें। हमसे जुड़े, इस वीडियो को शेयर करें। नमस्कार, मैं हूं शुभांकर मिश्रा और यह बहुत सेंसिटिव इशू है क्योंकि हिंदुस्तान में आम आदमी की जान कीमत का वो एहसास नहीं होता और यही एहसास हर हिंदुस्तानी को विदेश जाने पर होता और इसी वजह से जैसे ही हिंदुस्तान में कोई आदमी चार पैसा कमाता है वो विदेश में जाकर सेटल्ड हुआ है। जो विदेश गया वो हिंदुस्तान वापस आना नहीं चाहता क्योंकि उसे लगता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार यहां पर हिंदुस्तान में कीमत नहीं है। विदेश में वो भले ही अपना बर्तन सफाएगा, बर्तन माजेगा, सारे अपने काम करेगा लेकिन वो हिंदुस्तान नहीं लौट। तो जबकि वो जानता है कि हिंदुस्तान लौटेगा तो वही काम उसका कोई सस्ते में कर सकता है। लेकिन वहां सस्ते में इसलिए नहीं होता क्योंकि वहां इंसान की कीमत है। यहां इंसान की कीमत नहीं है। और इसीलिए आज हम समझने वाले हैं कि करोड़ों लोग हर साल अचानक भारत में गरीब क्यों हो रहे हैं।

10 करोड़ बहुत बड़ा नंबर है साहब। 10 करोड़ लोग अगर हर साल गरीब हो रहे हैं तो यह बहुत बड़ी बात है और आपको लग रहा होगा कि हो सकता है मैं बढ़ा चढ़ाकर अपना वीडियो वायरल करने के लिए बोल रहा हूं। तो ऐसा नहीं है। मैं आपको बता दूं। 2018 में तीन रिस्चरर्स ने एक स्टडी की थी जिसका टारगेट था यह पता करना कि भारत में दवा इलाज के खर्च में मिडिल क्लास को कितना नुकसान होता है। उन्होंने साल 2012 के हर मेडिकल खर्चे 2012 के खर्चे और आम आदमी की कमाई को ट्रैक किया। नतीजा जानते हैं क्या निकला? एक साल में 5.5 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे गिर गए। ये वो लोग थे जो ना जुआ खेल रहे थे, ना लॉटरी खेल रहे थे, ना मार्केट क्रैश हुआ, ना कोई आपदा आई थी। बस यह वो लोग थे जो नॉर्मल जिंदगी जी रहे फिर बीमार पड़े और बीमार पड़ते ही यह गरीब हो गए। क्यों? क्योंकि सारे पैसे अस्पताल में चले गए। अब इस स्टडी के अंदर एक आंकड़ा और डरावना था। इन 5 करोड़ में पौने करोड़ लोग सिर्फ दवाई खरीदने की वजह से गरीब हुए थे। केवल दवा सिर्फ दवा की पर्ची ने पौने करोड़ लोगों को गरीबी के नीचे धकेल दिया। फिर डब्ल्यूho ने मान लिया कि यह हादसा हर साल हो रहा है। और उसके बाद फिर से जांच करवाई। यह हुआ कि नहीं हो सकता है यह फर्जी आंकड़ा हो। नीति आयोग ने दोबारा जांच की। पता लगा यह आंकड़ा 10 करोड़ तक पहुंच गया है। यानी हिंदुस्तान की 7% आबादी ऐसी है जो हर साल सिर्फ इलाज के खर्चे से गरीब हो जाती है। कितनी बड़ी बात है ना? और इस बर्बादी की जड़ वही चार लेटर जिसका जिक्र हमने शुरू में किया था।
ओपपीई आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर। दरअसल किसी भी देश में दवा इलाज पर साल भर में जो पैसे खर्च होते हैं उसे देश का टोटल हेल्थ खर्च कहते हैं। हमारे देश का यह सालाना खर्च करीब ₹9 लाख करोड़ का है। यह खर्च तीन सोर्सेस मिलकर भरते हैं। इलाज पर खर्च हुए हर ₹100 में आम आदमी अपनी जेब से ₹43 भरता है। सरकार ₹44 और बाकी 13 दूसरे सोर्स से। जो हिस्सा आम आदमी भरता है अपनी जेब से उसे ही ओपीई कहते हैं। जिस देश में ओपपी का परसेंटेज सबसे ज्यादा होता है उस देश में इलाज उतना ही मुश्किल होता है। उतना ही महंगा होता है। उस देश के आम आदमी पर अचानक गरीब होने या कर्जदार होने का खतरा हमेशा बना रहता है। जैसे उदाहरण देते हैं हम आपको। थाईलैंड जैसे देश में इस मामले में जापान और इंग्लैंड जैसे देशों के साथ खड़े नजर आते हैं। थाईलैंड जैसा देश जापान और इंग्लैंड के साथ नजर आता है। जैसे मैं इंग्लैंड गया था पिछले साल तो एक हैदराबाद का व्यक्ति वहां ड्राइवर था। हालांकि वहां के ड्राइवर बहुत पैसा कमाते हैं। उसका रीज़न हमने आपको बताया कि वो जो इंसान काम करते हैं उसको इज्जत देते हैं। तो हमने उससे पूछा यार तुम्हें दिक्कत क्या है? तो वह हमसे कहा कि भैया दिक्कत यह है कि यार अकेले पड़ गए हैं। परिवार वाले वहां हैं। खुशियां जो है वह हिंदुस्तान में मिलती हैं। हमने कहा फिर यहां रुके क्यों? बोले भैया यहां शिक्षा स्वास्थ्य कमाल का है। मतलब आप जहां रहते हैं उसके पड़ोस में जो अस्पताल है सरकारी मैं भी वहां जाता हूं। वहां पे करोड़पति उद्योगपति का लड़का भी जाता है। उसी स्कूल में हमारा लड़का पड़ेगा। उसी वहां पढ़ेगा। हमारे यहां प्राइवेट स्कूल प्राइवेट हॉस्पिटल में लोग जाते ही नहीं है। और मेरा दिमाग खराब हो गया। भारत में आप कल्पना नहीं कर सकते। भारत में ट्रेन हो या अस्पताल आपको पैसे का औकात का अंतर दिख जाता है और हैरानी ये हो रही है कि थाईलैंड जैसा देश भी इस मामले में जापान और इंग्लैंड के साथ आता है और अब आपके मन में सवाल आ गया कि भैया हम कहां स्टैंड करते हैं तो आपको शर्मिंदगीगी हो जाएगी कि या हो सकता है कुछ लोग आप में से थोड़ी छाती फुला ले कि हम बांग्लादेश और पाकिस्तान से थोड़ा सा बेहतर है। लेकिन शर्म से डूब जाएंगे आप यह जानकर कि भूटान जैसा छोटा सा देश भी इस लिस्ट में हमसे आगे खड़ा है।

सोचिए इलाज की पहुंच और क्वालिटी की एक ग्लोबल रैंकिंग में भारत 195 देशों में 145वें नंबर पर है और उस लिस्ट में बांग्लादेश और श्रीलंका भी हमसे ऊपर है। यानी खर्च में हम बांग्लादेश से बेहतर है। लेकिन इलाज में बांग्लादेश हमसे बेहतर है। वो पैसा वहां सरकार हमसे आती है। यहां पर हम पैसा देते हैं। इलाज हमें कम मिल रहा है। और अब वो खबर जो शायद आपको कहीं नहीं मिलेगी। अभी दो महीने पहले 2026 में सरकार की अपनी नेशनल हेल्थ अकाउंट रिपोर्ट आई। उसमें छुपा है कि इस दशक का सबसे खतरनाक ट्रेंड 10 साल से आम आदमी की जेब पर यह बोझ हर साल थोड़ा-थोड़ा घट रहा था। लेकिन इस बार पहली बार यह बोझ घटने के बजाय बढ़ा। 39 से सीधे 43% यानी एक साल में 4%। क्यों? क्योंकि कोविड गया तो सरकार का हाथ भी आपकी हेल्थ से खींच गया। कोविड के वक्त सरकार जो है वह थोड़ा ज्यादा पैसा दे रही थी। हर 100 में ₹48 भर रही थी। लेकिन अब वापस सरकार ने कटौती की है 44 पर और वो जो कटौती हुई है वो कौन भरेगा? हम और आप और इसीलिए हर साल 10 करोड़ आदमी भारत में गरीब हो रहा है। अब रिपोर्ट की कड़वी लाइन महंगाई हटाकर देखें तो पिछले साल हर भारतीय को अपने पैसे के बदले पहले से कम इलाज मिला और उस कम इलाज का भी ज्यादा हिस्सा उसने अपनी जेब से भरा। अब इस ओप के बोझ को कम करने के भारत में दो रास्ते हैं।
एक रास्ता है सरकार के हाथ कि सरकार अपनी नीतियों को बदले और जिन अच्छे देशों के नाम हमने लिए जहां पर हेल्थ में खर्चा किया है। सरकार वहां पर उनका फार्मूला उठाकर हमारे आपके ऊपर खर्चा करने लगे और हम और आप गरीब नहीं होंगे। और एक है आपके अपने हाथ में भी। हां जी आपके अपने हाथ में भी है। क्योंकि यहीं पर खेल आता है इंश्योरेंस कंपनियों का। इंश्योरेंस कंपनियां जो आपको रोज लुटेरी और डकैत लगती हैं। लेकिन तब तक जब तक आपका सामना असल डकैत यानी कि प्राइवेट अस्पताल से नहीं होता। हां जी। अब ये जो 43 हमने बताया ओप इसको आप जीरो कैसे करोगे? जिस तरह आप सड़क के जानलेवा गड्ढे खुद ठीक नहीं कर सकते क्योंकि वो सरकार का काम है। पर आप बाइक चलाते वक्त हेलमेट यही सोच कर पहनते हैं कि सड़क ना सही पर अपनी सेफ्टी तो अपने कंट्रोल में है। उसी तरह सरकार अगले ही दिन देश के हर नागरिक के हेल्थ पर ₹44 से ज्यादा खर्च करने लगे। यह हमारे आपके हाथ में नहीं है मोदी जी के हाथ में। या तो आप भी जंतरमंतर पर बैठ जाइए और कितना सुना जाता है वो आप जानते हैं। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि वो जंतरमंतर वाला फार्मूला आप ना अपनाएं और अस्पताल में होने वाला आपका ₹43 का खर्च हर 100 में जीरो हो जाए तो यह आपके हाथ में है या कहें आपकी उंगलियों पर है।
आपके एक सिंगल क्लिक से 400 से ₹500 आपको हर महीने खर्च करने होंगे और टर्म और हेल्थ इंश्योरेंस आप बुद्धिमान बनकर खरीद लीजिए। यह इंश्योरेंस ना सिर्फ बेहद अफोर्डेबल है बल्कि मुश्किल वक्त में करोड़ों तक की मदद करते हैं और इसको आप प्रचार मत समझिएगा क्योंकि हमने आपको बताया हर साल 10 करोड़ आदमी मिडिल क्लास से गरीब बन रहे हैं। गाड़ी का इंश्योरेंस आप इसलिए नहीं करवाते हैं कि गाड़ी ठोक देंगे। इसलिए करवाते हैं कभी गलती से कोई नुकसान हुआ तो पूरा क्लेम ले लेंगे। ऐसे ही मेडिकल इमरजेंसी के समय यह हेल्थ इंश्योरेंस करोड़ों तक के मेडिकल बिलों को कवर करता है। भगवान ना करे लेकिन कल को कुछ हो गया तो आपके परिवार को इससे करोड़ों तक कवरेज मिल जाएगा। जिससे वो बिना किसी और पर डिपेंड रहे बिना अपने होम लोन, ईएमआई और बच्चों की पढ़ाई खुद को संभाल सकते हैं। देखो भैया, थोड़ा सा कटौती करके अगर यह हो जाता है, तो हम सबको समझना चाहिए। जैसे पहले हम भी नहीं करते थे। लेकिन जैसे-जैसे जिम्मेदारियां बड़ी होती हैं, वैसे-वैसे समझदारी भी बढ़ानी पड़ती है। आज आपकी तिजोरी में जो पैसा है या आपकी जेब में है उसके एक सिक्के से आज आप इंश्योरेंस खरीद सकते हैं। पर किसी दिन अगर गलती से उस तिजोरी पर प्राइवेट अस्पताल की नजर पड़ी तो तिजोरी छोड़िए। वो हाथ में कटोरा भी नहीं छोड़ते हैं। और एक चीज आप और समझिएगा कि यह इंश्योरेंस कोई इन्वेस्टमेंट नहीं है। यह मत सोचिएगा कि ले लिए तो 4 पैसा आएगा।
भगवान करे जरूरत ना ही पड़े। भगवान करे ना पड़े जरूरत भाई अच्छा है ना नहीं पड़ी अगर आप इस्तेमाल नहीं कर रहे जाने दो लेकिन अगर पड़े तो आपको लाभ देगा यह आपके परिवार की सबसे बड़ी जरूरत बनेगा हां कौन सा प्लान चुनना है या फैसला आपका है पर समय रहते सही फैसला लीजिए डिस्क्रिप्शन में हमने आपको लिंक दिया है जाइए और अपने परिवार के लिए बेस्ट जो भी है वो चुन लीजिए वो आपकी मर्जी हमको कोई लेना देना नहीं है हमारा लेना देना इस बात से है कि जब आदमी जानता है कि लुटेगी तब भी वह प्राइवेट अस्पताल के चक्कर में क्यों पगला रहता है? क्योंकि सबको पता है कि जीवन पर आपका हमारा कंट्रोल नहीं है। समस्या आम आदमी की जेब से होने वाला खर्च नहीं है। आदमी जानबूझकर मजबूर होता है कि खर्चा करें। कैसे हम समझाते हैं। इस देश में जब भी कोई मिडिल क्लास का व्यक्ति बीमार होता है तो उसकी हालत ऐसी होती है कि एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई। एक तरफ सरकारी अस्पताल भारत का जो अंधेरे कुएं जैसा है जहां सब कुछ भगवान भरोसे दूसरी तरफ प्राइवेट अस्पताल वहां इतनी गहरी खाई जिसका कोई तल नहीं वहां से वही बस कर निकलता है जिसने दबा के पैसा बनाया है यानी सरकारी अस्पताल में भरोसा कम होता है और प्राइवेट में जमा पूंजी खोने का डर होता है और इस देश में आम आदमी को हर रोज इन्हीं दो डरों के बीच में जीना पड़ता है और जब परिवार में किसी गरीबी के साथ दुटना होती है तो ये परेशान करता है लेकिन लेकिन फिर भी लोग प्राइवेट जाते हैं। वो कर्जा लेते हैं, बेच देते हैं। ये जानते हुए भी कि एक बार प्राइवेट का चक्कर लगाने पर उन्हें कितना फटका लेगा। मतलब प्राइवेट का और सरकारी का अंतर समझ लीजिए जितने में सात बार सरकारी अस्पताल में इलाज होता है उतना प्राइवेट में एक बार में होता है और यह हमारा आंकड़ा नहीं है। यह सरकार का आंकड़ा है कि मान लीजिए अगर आपने सरकारी में कोई चीज इलाज करवाया और आपका ₹452 खर्चा हुआ तो वही प्राइवेट अस्पताल में ₹31845 खर्चा होगा। यह सरकार का आंकड़ा है और आज की कहानी तो और डरावनी क्योंकि इस समय देश में टमाटर, पेट्रोल, सब्जी हर चीज की महंगाई बढ़ रही है। अब तो आपकी गाड़ी का माइलेज भी जो है वो भी कम हो गया। वहां भी आपको साल में अगर बेसिक भी मान लें तो ₹7,000 और ज्यादा खर्चा करना पड़ेगा। और मेडिकल की महंगाई बाप रे 12% रफ्तार से बढ़ी है। बाकी सब तो कम बढ़ी है।
जो पेट्रोल टमाटर हम लोग रोते हैं ये 4% बढ़ी है। मेडिकल की महंगाई 12% है। यानी इलाज आपकी तनख्वाह से तीन गुना तेजी से भाग रहा है और बचत की सीढ़ी आप चढ़ रहे हैं। इसीलिए हम कह रहे हैं कि सोचिए समझिए। एक बार भी कोई सरकारी अस्पताल का मुंह देखना नहीं चाहता। और सात बार जितना डिफरेंस आता है आप सोच लो सरकारी अस्पताल में घुसते ही आप जानते हो वहां क्या हालत होती है। आधी जगह तो नंबर ही नहीं लगता। जो अच्छे अस्पताल है जैसे एम्स अस्पताल अच्छा है। आप गरीब आदमी एक बार में चले जाओ। आज आपकी तबियत खराब हुई है। वो दो महीना बाद आपका नंबर लेगा। बैठे रहो बाहर। वीडियो की शुरुआत में वो महिला बताया था हमने आपको भाई ना कि अस्पताल के बाहर खड़े-खड़े डिलीवरी हो गई। एक बेड तक नहीं पाई। यही सच है कि बिना जुगाड़ के एंट्री ही नहीं मिलती। बड़मनाई होगी तो वहां भी मिल जाएगी और बड़े आदमी का पैसा भी है। एंट्री लेवल मतलब यह है कि इस देश में मरीज के घर वाले अस्पताल जाते ही यह सोच कर रहे हैं कि बेड तो मिलेगा नहीं। डॉक्टर मिल जाए, दवाई मिल जाए समय पर और प्राइवेट अस्पताल अब बन गए हैं कंपनी। उनको एक बिल निकालना है। जैसे कुछ दिन पहले हमारे पेट में गैस हुई थी। हम गए। अब गैस में उन्होंने हमको बिस्तर पर लिटा दिया। बिस्तर पर लिटाया। उसके बाद दो बोतल लगा दी। आधा घंटा चू च करती रही। गैस में उन्होंने हमारे लिए लगभग ₹4000 का बिल बना दिया था। हमने कहा Jio बहादुर और आपके आसपास भी होंगे। किसी भी प्राइवेट अस्पताल में जाइए। प्राइवेट अस्पताल ये नहीं कह रहे कि सारे चोर हैं। बट भारत में जितने भी प्राइवेट अस्पताल जो कंपनी बन गए हैं उनका एक बिल्डिंग का प्रोसेस है। उनको इतना बिल निकालना है महीने में वो गुणा गणित उस हिसाब से जोड़ते हैं। तो आपकी जांच टेस्ट बिल बढ़ाते हैं। वो चाहते हैं आप आते रहे। आप उनके लिए कस्टमर हैं। मरीज नहीं है। और इसीलिए यह खबर आपके लिए सावधान करने वाली है। बाकी मध्य प्रदेश का तो हमने सरकारी अस्पताल आपको बताया कि भैया वहां पे चूहा जो है कितनी खतरनाक बात थी यार। एक बच्चे को नोच गया। इंदौर के खजराना में 100 बेड का सरकारी अस्पताल छ साल से चल रहा है। लेकिन पेपर पर कागज पर 87 कर्मचारी हैं। नियुक्तियां हो रही है। तबादले हो रहे हैं। अस्पताल की जमीन पर आपको एकट नहीं मिलेगी। और ये कोई पुरानी बात नहीं है। अभी पिछले महीने जून 2026 में उस अस्पताल के नाम पर एक ट्रांसफर ऑर्डर निकला है। उस अस्पताल में जिसमें आज तक कोई मरीज गया ही नहीं। यह हमारे हिंदुस्तान का एक कड़वा सच है। अच्छे अस्पताल भी हैं। मैं फिर कह रहा हूं हिंदुस्तान अच्छे भी अस्पताल हैं। लेकिन अच्छे सरकारी अस्पतालों में नंबर लगना बहुत मुश्किल है। बहुत मुश्किल है। और ये पुर्तगाल वाला सिस्टम तो बिल्कुल नहीं है कि पुर्तगाल में एक बेड नहीं मिला तो मिनिस्टर की 5 घंटे में कुर्सी चली गई। हमारे हिंदुस्तान में पूरा अस्पताल गायब है। किसी से कोई दिक्कत नहीं है। कहीं-कहीं दो चार ईंट जोड़कर अस्पताल खड़ा है। उसकी हालत ऐसी नहीं आप समझ पाते कि हम बीमार है, अस्पताल बीमार है। या यह अस्पताल है या हॉरर मूवी का सेट। और चूहा वाली बात तो हमको अब तक डराती है। इंदौर के सरकारी अस्पताल में एनआईसीयू में जहां नवजात बच्चों को आईसीयू वो जगह जहां चप्पल पहन कर जाना अलाउड नहीं था। उस साफसथरे एनआईसीयू में दो नवजात बच्चों को चूहे को उतर गए थे आप और दोनों की मौत हो गई थी।
केरल के एक सरकारी अस्पताल में 9 साल की बच्ची टूटा हुआ हाथ लेकर गई। फ्रैक्चर के साथ सिक्के जितना छोटा घाव था। डॉक्टर ने उस घाव को नजरअंदाज करके ऊपर से प्लास्टर लगा दिया। प्लास्टर के नीचे इंफेक्शन फैलता रहा और बाद में बिटिया का हाथ काटना पड़ा। पांच सर्जरी एक महीने से ज्यादा आईसीयू और यह मैं नहीं कह रहा हूं। केरल हाई कोर्ट ने खुद माना था कि 9 साल की बच्ची सरकारी अस्पताल की गंभीर लापरवाही का शिकार और ऐसी अनगिनत खबरें हैं आपके अपने शहर में ना हो जाके अपने देख लो अस्पताल में। तो ऐसी डरावनी खबरें सुनने के बाद आम आदमी फिर फैसला करता है कि प्राइवेट अस्पताल जाएंगे। इस हकीकत से अनजान कि उसका फैसला उसकी चॉइस नहीं है। उसकी इल्लुजन ऑफ चॉइस है। अब इल्लुजन ऑफ चॉइस क्या होता है? अंग्रेजी का शब्द आप में से बहुत लोग कहेंगे भैया समझा दो। तो एग्जांपल देते उदाहरण पहले जमाने में जब किसी बच्चे को अंगूठा चूसने की आदत थी तो कुछ माएं बच्चे के अंगूठे पर मिर्ची लगाती थी। बच्चा जैसे अंगूठा मुंह में डाला पूरा अंदर तीखातीखा। यही चीज जब बार-बार हो जाए तो बच्चे खुद से वो आदत छोड़ देते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि ये उनकी चॉइस नहीं होती है। यह इल्लुजन ऑफ चॉइस होती है। अब इस कहानी को अपने ऊपर रख के देखिए। क्योंकि सरकारी अस्पताल की ये बदहाली, गंदगी, दुर्दशा, बेड ना मिलना, बच्चों को चूहे खा जाना ये सारी खबरें सुनसुनकर आपके दिमाग में एक डर पैदा हो गया। ये वही मिर्ची है जो जानबूझकर आपके अंगूठे पे लगाई गई है। ताकि अगली बार आप अपनी मर्जी से सरकारी अस्पताल में जाए ही ना और सीधे प्राइवेट की लाइन में लग जाए और प्राइवेट जाने का मतलब खर्चा। और इसीलिए तो खर्चा हो रहा है देश का। अब आपके मन में सवाल होगा कि प्राइवेट अस्पताल की तरफ आम आदमी क्यों जा रहा है? इसका जवाब है 4 लाख करोड़ जो हर साल आम आदमी खर्च कर रहा है। वो लोग जिनकी हॉस्पिटल चेन है या पैथोलॉजी ब्रांड है या वो जो बड़ी-बड़ी दवा कंपनियों के मालिक हैं और दवा वालों का हिस्सा कितना बड़ा है इसको आपको एक स्टडी समझाते हैं। भारत में इलाज से गरीब हुए लोगों में 70% लोग गरीब सिर्फ दवा खरीदने से हुए थे। वो पर्ची डॉक्टर थमाता है और यह लोग कभी नहीं चाहेंगे कि आम आदमी की जेब का बोझ कम हो क्योंकि इससे उनकी जेब हल्की होती है। उल्टा ये लोग आपका पैसा चूसने के लिए किसी हद तक जाते हैं। जैसा हमने बताया इस साल मई में देश में एक रिपोर्ट आई थी। कंपटीशन कमीशन की दिल्ली एनसीआर के 12 बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल पर करीब 10 साल से जांच पूरी हुई और जांच करने वाली रिपोर्ट ने जिक्र किया लॉक्ड इन पेशेंट। यानी एक मरीज प्राइवेट अस्पताल में अगर एक बार एडमिट हो गया तो वो आजाद नहीं होता।
वो अस्पताल का गुलाम बनता है। उससे जो कहा जाता है वो डर के मारे मान लेता है क्योंकि ना मानने का मतलब जानना खतरा और इसी डर के आधार पर पर्चियों का खेल शुरू होता है। कभी दवा, कभी जांच, कभी किसी और चीज की पर्ची आपको दी गई। आप इस पर्ची को बाहर किसी दुकान पर ले नहीं जा सकते क्योंकि अस्पताल से खरीदना है या उनके मेडिकल हॉस्पिटल से जहां दाम की मनमानी। अस्पताल का बेड इस देश की सबसे महंगी जमीन है। सरकारी में मिलता नहीं और प्राइवेट में छूटता नहीं। जांच में सामने आया कि दिल्ली के बड़े अस्पताल में कुछ टेस्ट बाहर की लैब के मुकाबले 243% महंगे थे। और मजे की बात 12 में से सिर्फ एक अस्पताल ऐसा निकला जो मरीजों को बाहर से दवा और जांच करवाने की छूट दे रहा था। बाकी सब हमारे यहां करवाओगे तो ही तुम्हारा इलाज है। अब आप सोचिए कि मैं बाहर से दवा ले आऊं। तो यह पेपर साइन करवाते हैं कि मरीज को बाहर की दवा दी जा रही है। हॉस्पिटल की जिम्मेदारी नहीं। आदमी को लगता है भैया हॉस्पिटल की जिम्मेदारी नहीं मतलब जान हमारी खतरे में और यहीं से डर पे आप फिर यहां रुक जाते हैं। सोचते हैं चार पैसा जाए हमारा घर वाला बचा रहे हैं। इस कहानी क्लाइमेक्स सुनाते हैं। 10 साल की जांच सारे आंकड़े सारे सबूत जब आखिर में कमीशन ने केस बंद किया तो कहा सबूत काफी नहीं है। यानी सिस्टम ने खुद मांगा कि मरीज लॉक हो गया। बस यह मानने से इंकार कर दिया कि कोई लूट रहा है। हालांकि यह सब आम आदमी के साथ नहीं होता। अगर सरकार अपने ₹44 भी सही से खर्चा कर देती लेकिन सरकार करेगी नहीं। करना चाहेगी तो करने नहीं दिया जाएगा। क्योंकि इस 4 लाख करोड़ की रकम के हिस्सेदार इतने ताकतवर हैं कि यह मेक श्योर करते कि उनके एरिया के सरकारी अस्पताल बदहाल रहे।
क्योंकि अगर सरकारी अस्पताल अच्छे हो गए तो उस इलाके का मरीज वहां चला जाएगा। इसीलिए सरकारी अस्पतालों में जानबूझकर दवा आउट ऑफ स्टॉक की जाती है। डॉक्टर कमीशन के लिए वो दवा लिखते हैं जो अस्पताल में होती नहीं। छोटे-छोटे टेस्ट के लिए मशीन खराब या बिजली नहीं के बहाने दिए आते हैं। हाल ये है कि आम आदमी खुद सोचता है यार जब हर चीज बाहर जाना है तो ससुर यहां काहे आ रहे हैं और उसी के बाद आप जाते हैं प्राइवेट में। अब इससे निकलने का रास्ता कोई तोड़ है? है भाई साहब हम आपको बताएंगे। अगली बार जब कोई नेता आपके दरवाजे पर वोट मांगने आए तो उससे मंदिर, मस्जिद, जातपात मत पूछिएगा और पूछिएगा कि मेरा ₹44 कहां गया? मेरे इलाके के अस्पताल में बेड क्यों नहीं है? दवा क्यों नहीं है? क्योंकि जिस दिन यह सवाल वोट से जुड़ जाएगा उस दिन हर सरकारी अस्पताल में बेड भी होगा, दवा भी होगी और यह कोई हवा बात नहीं है। खुद सरकार का इकोनॉमिक सर्वे कह चुका है अगर सरकारी खर्च बढ़ा दिया जाए तो आम आदमी की जेब का यह बोझ 43 से गिरकर 30 पर आ सकता है और अगर ऐसा हुआ तो देश का टोटल हेल्थ खर्च अपने आप गिर जाएगा क्योंकि जहां 44 लगती है वहां इलाज आम आदमी को नहीं मिलता। तमाम आदमी मजबूर होकर खर्चा करता है और यहीं से वो पढ़ता है। आसान शब्दों में समझिए अगर सरकारी स्कूल अच्छे हो जाए तो कौन प्राइवेट में फर्जी फीस देना चाहेगा? दूसरी चीज यह कि हमारे देश में इंश्योरेंस का कल्चर भी डेवलप होना चाहिए। जनता को समझना पड़ेगा कि इंश्योरेंस कंपनियां लुटेरी नहीं है। उल्टा ये कंपनियां आपको राहत देती हैं।
