इंदौर: जरा सोचिए, जिस मां ने अपने बच्चे के लिए शादी के बाद पूरे 10 साल इंतजार किया हो। इलाज कराया हो, मन्नतें मांगी हों और गर्भ ठहरने के बाद पूरे नौ महीने बेहद सावधानी के साथ गुजारे हों। अगर वही मां जन्म के महज पांच महीने बाद अपने बच्चे को हमेशा के लिए खो दे तो उस परिवार पर क्या बीतेगी? इंदौर के भागीरथपुरा की दूषित पानी की त्रासदी में एक ऐसी ही दर्दनाक कहानी सामने आई, जिसने हर किसी को झकझोर दिया।
भागीरथपुरा में दिसंबर 2025 के आखिर में दूषित पानी के कारण उल्टी-दस्त और गंभीर बीमारी का प्रकोप फैल गया था। बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े और कई लोगों की मौत हुई। बाद की जांचों में मौतों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए, लेकिन सरकारी और चिकित्सकीय जांच में दूषित पानी के प्रकोप से कई मौतों का संबंध सामने आया।
इसी त्रासदी में पांच महीने के मासूम दिव्यान/अव्यान की मौत ने हर किसी को भावुक कर दिया।
10 साल बाद घर में आई थी खुशी
दिव्यान के परिवार के लिए यह बच्चा सिर्फ एक बच्चा नहीं था, बल्कि वर्षों के इंतजार के बाद मिली खुशी था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उसकी मां साधना साहू ने बच्चे को पाने के लिए लंबे समय तक इंतजार किया था। परिवार के लिए उसके जन्म का दिन किसी उत्सव से कम नहीं था।
रिपोर्टों के अनुसार, बच्चे का जन्म शादी के करीब 10 साल बाद हुआ था। मां ने गर्भावस्था के दौरान बेहद सावधानी बरती और बच्चे को लेकर परिवार में बहुत उम्मीदें थीं। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि जिस बच्चे के लिए परिवार ने एक दशक इंतजार किया, उसकी जिंदगी महज पांच महीने में खत्म हो जाएगी।
मां का दूध पिलाती थी, लेकिन भूख लगने पर देती थी ऊपर का दूध

दिव्यान की मां के मुताबिक, वह अपने बच्चे को अपना दूध पिलाती थीं। लेकिन जब बच्चा ज्यादा रोता और मां का दूध उसके लिए पर्याप्त नहीं होता तो परिवार उसे ऊपर का दूध भी देता था।
रिपोर्टों में मां के हवाले से बताया गया कि गाय या भैंस के दूध को बच्चे के लिए हल्का करने के लिए उसमें पानी मिलाया जाता था। उस दिन भी बच्चे को दूध में पानी मिलाकर दिया गया था।
परिवार को उस समय यह अंदाजा नहीं था कि जिस पानी को वे सामान्य समझकर इस्तेमाल कर रहे हैं, वही उनके मासूम बच्चे के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में भी मां के हवाले से बताया गया कि उन्होंने बच्चे के दूध में पानी मिलाया था और बाद में उसकी हालत बिगड़ गई।
अचानक बिगड़ी तबीयत
इसके बाद मासूम की तबीयत खराब होने लगी। उसे उल्टी और दस्त की शिकायत हुई। भागीरथपुरा में उस समय बड़ी संख्या में लोग इसी तरह की बीमारी से परेशान थे। कई मरीजों को अस्पतालों में भर्ती कराया जा रहा था।
दिव्यान को भी इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई और आखिरकार वह जिंदगी की जंग हार गया।
एक मां के लिए इससे ज्यादा दर्दनाक स्थिति शायद ही कोई हो सकती है। जिस बच्चे को उसने अपनी गोद में पांच महीने तक संभाला, जिसके लिए परिवार ने दस साल तक इंतजार किया, वही बच्चा उसकी आंखों के सामने उससे हमेशा के लिए दूर हो गया।
भागीरथपुरा में दूषित पानी ने मचाई तबाही
भागीरथपुरा में दूषित पानी की समस्या ने दिसंबर 2025 के अंतिम दिनों में गंभीर रूप ले लिया था। बड़ी संख्या में लोगों को उल्टी, दस्त और बुखार जैसी शिकायतें होने लगीं। अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।
शुरुआती दिनों में मौतों के आंकड़े को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। बाद में डॉक्टरों की एक समिति की जांच में कम से कम 15 मौतों को दूषित पानी से फैले प्रकोप से जोड़ने की बात सामने आई। प्रशासन की रिपोर्ट में भी 14 मौतों को दूषित जल संक्रमण से संबंधित माना गया था।
पानी के नमूनों में ई. कोलाई, साल्मोनेला और विब्रियो कॉलेरी जैसे रोगजनकों की मौजूदगी की रिपोर्ट भी सामने आई। जांच में पाइपलाइन में सीवेज के पानी के मिलने की आशंका और पुरानी पाइपलाइन से जुड़ी समस्याओं का भी जिक्र किया गया।
सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं
दिव्यान की मौत सिर्फ एक परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है। यह घटना उस बड़े सवाल की तरफ भी ध्यान खींचती है कि किसी शहर के लोगों तक पहुंचने वाला पीने का पानी कितना सुरक्षित है।
जब पानी की पाइपलाइन और सीवेज सिस्टम में गड़बड़ी होती है तो उसका सबसे ज्यादा असर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर स्वास्थ्य वाले लोगों पर पड़ सकता है। दूषित पानी से होने वाली बीमारियां कुछ मामलों में बेहद तेजी से गंभीर रूप ले सकती हैं।
यही वजह है कि पीने के पानी की नियमित जांच, पाइपलाइन की निगरानी और सीवेज सिस्टम की सुरक्षा केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि लोगों की जिंदगी से जुड़ा विषय है।
मां की गोद हमेशा के लिए सूनी हो गई
इस पूरी कहानी का सबसे भावुक हिस्सा यही है कि दिव्यान की मां ने उसे खोने की कल्पना भी नहीं की होगी।
दस साल तक मां बनने का इंतजार। फिर गर्भावस्था के नौ महीने। बच्चे के जन्म के बाद पांच महीने की छोटी-सी दुनिया। और फिर अचानक बीमारी ने सब कुछ खत्म कर दिया।
मां के लिए शायद सबसे मुश्किल सवाल यही होगा कि आखिर उसके बच्चे की गलती क्या थी?
वहीं, इस घटना से यह सवाल भी उठता है कि क्या ऐसी त्रासदियों को समय रहते रोका जा सकता था? अगर पानी की गुणवत्ता की निगरानी और पाइपलाइन व्यवस्था पहले से मजबूत होती तो क्या इस तरह का प्रकोप टाला जा सकता था?
इन सवालों के जवाब जांच और प्रशासनिक कार्रवाई से ही मिल सकते हैं।
एक मासूम की मौत से मिले बड़ा सबक
भागीरथपुरा की यह घटना बताती है कि साफ और सुरक्षित पानी कोई सुविधा नहीं बल्कि बुनियादी जरूरत है। एक दूषित पानी की लाइन कितने परिवारों की जिंदगी बदल सकती है, इसका दर्दनाक उदाहरण यह त्रासदी है।
दिव्यान अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी कहानी एक सवाल छोड़ गई है—क्या किसी मां को अपने बच्चे को सुरक्षित पानी पिलाने के लिए भी अपनी किस्मत पर निर्भर रहना पड़ेगा?
जरूरी है कि इस तरह की घटनाओं की निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदारी तय हो और भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो। क्योंकि किसी परिवार के लिए उसका बच्चा सिर्फ एक आंकड़ा नहीं होता। वह उसकी पूरी दुनिया होता है।
