15 फरवरी 2009 की सुबह अनुराग ने अपने पिता प्रोफेसर पुरुषोत्तम लाल सचदेवा को फोन किया। फोन की घंटी बजती रही, लेकिन दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं आया। अनुराग ने दोबारा फोन किया, लेकिन फिर भी फोन रिसीव नहीं हुआ।
उसे लगा कि शायद पिता किसी काम में व्यस्त होंगे। इसके बाद उसने अपनी मां रीता को फोन किया। लेकिन मां ने भी फोन नहीं उठाया।
घर में प्रोफेसर पुरुषोत्तम लाल, उनकी पत्नी रीता और उनका 32 वर्षीय बेटा दीपक रहते थे। दीपक विशेष जरूरतों वाला बेटा था, इसलिए अनुराग उससे फोन पर संपर्क नहीं कर सकता था।
अनुराग ने शुरुआत में इस बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। उसे लगा कि शायद उसके माता-पिता कहीं बाहर गए होंगे और फोन उनके पास नहीं होगा।
लेकिन अगले दिन यानी 16 फरवरी को भी उसने कई बार फोन किया। इस बार उसकी चिंता बढ़ने लगी थी। लगातार फोन करने के बावजूद किसी ने फोन नहीं उठाया।
आखिरकार अनुराग ने अपने पड़ोसी अंकल राजेश दीवान को फोन किया।
अनुराग ने उनसे कहा कि वह पिछले कुछ दिनों से घर से बाहर है और कल से लगातार अपने माता-पिता को फोन कर रहा है, लेकिन कोई भी फोन नहीं उठा रहा। उसने राजेश से घर जाकर देखने की गुजारिश की कि आखिर सब कुछ ठीक है या नहीं।
राजेश तुरंत प्रोफेसर पुरुषोत्तम लाल के घर पहुंचे।
खिड़की से दिखाई दिया खौफनाक मंजर
घर का दरवाजा बंद था।
राजेश ने दरवाजा खटखटाया, लेकिन अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने खिड़की से अंदर झांकने की कोशिश की।
जैसे ही उनकी नजर घर के अंदर गई, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

हॉल में 32 वर्षीय दीपक की लाश पड़ी थी। वह खून से लथपथ था। लेकिन घर में प्रोफेसर पुरुषोत्तम लाल और उनकी पत्नी रीता कहीं नजर नहीं आ रहे थे।
राजेश ने तुरंत अनुराग को फोन किया और बताया कि घर का दरवाजा बंद है और अंदर दीपक की लाश पड़ी हुई है।
अनुराग ने बिना देर किए पुलिस को बुलाने के लिए कहा और खुद घर के लिए निकल पड़ा।
कुछ ही देर में पुलिस मौके पर पहुंच गई। दरवाजा तोड़कर पुलिसकर्मी घर के अंदर दाखिल हुए।
सबसे पहले उन्हें हॉल में दीपक का शव दिखाई दिया।
लेकिन जांच अभी बाकी थी।
पुलिस ने पूरे घर की तलाशी शुरू की। अधिकारियों को उम्मीद थी कि शायद प्रोफेसर पुरुषोत्तम लाल और उनकी पत्नी कहीं घायल अवस्था में मिल जाएं।
लेकिन अगले कमरे में जो दृश्य था, उसने पूरे मामले को और भयावह बना दिया।
एक कमरे में पति-पत्नी की लाश
पुलिस को कमरे के अंदर प्रोफेसर पुरुषोत्तम लाल और उनकी पत्नी रीता की भी लाश मिली।
घर के अंदर तेज दुर्गंध फैल चुकी थी और शवों की हालत खराब होने लगी थी। पुलिस ने मौके से कई चीजों को साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित किया। घटनास्थल पर एक दुपट्टा और मोबाइल फोन का चार्जिंग केबल भी मिला, जिन्हें जांच के लिए कब्जे में लिया गया।
प्रथम दृष्टया पुलिस को आशंका थी कि इन चीजों का इस्तेमाल वारदात में किया गया हो सकता है।
एक ही घर में तीन लोगों की मौत ने पूरे इलाके को दहला दिया।
यह कोई सुनसान इलाका नहीं था। यह एक ऐसी पॉश कॉलोनी थी जहां लोग खुद को सुरक्षित समझते थे। लेकिन अब हर व्यक्ति के मन में एक ही सवाल था—आखिर एक पढ़े-लिखे और शांत स्वभाव के प्रोफेसर के परिवार से किसी की ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती थी कि एक साथ तीन लोगों की जान ले ली गई?
पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती
मामला बेहद गंभीर था और पुलिस पर जल्द से जल्द हत्यारे तक पहुंचने का दबाव बढ़ गया था।
जांच अधिकारियों ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए। शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। आसपास के लोगों से पूछताछ की गई और परिवार से जुड़े लोगों की जानकारी जुटाई जाने लगी।
इसी दौरान अनुराग भी वहां पहुंच गया।
वह अपने माता-पिता और भाई की मौत की खबर सुनकर वापस आया था। लेकिन पुलिस की नजर में वह भी जांच के दायरे से बाहर नहीं था।
आखिरकार परिवार के तीन सदस्य मारे गए थे और घर में मौजूद परिस्थितियां कई सवाल खड़े कर रही थीं।
क्या यह संपत्ति से जुड़ा मामला था?
क्या परिवार की किसी से दुश्मनी थी?
क्या कोई ऐसा व्यक्ति था, जो इस घर की दिनचर्या और परिवार के सदस्यों के बारे में अच्छी तरह जानता था?
इन सवालों के जवाब पुलिस को तलाशने थे।
10 महीने तक नहीं मिला कोई ठोस सुराग
पुलिस ने अनुराग से भी कई बार पूछताछ की। अलग-अलग पहलुओं से जांच की गई। लेकिन लंबे समय तक ऐसा कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे मामले की गुत्थी सुलझ सके।
दिन बीतते गए।
हफ्ते बीते।
महीने बीत गए।
और देखते ही देखते करीब 10 महीने निकल गए।
लेकिन पुलिस अभी तक उस शख्स तक नहीं पहुंच पाई थी, जिसने इस पूरे परिवार को खत्म किया था।
जांच पर लगातार दबाव बढ़ रहा था। मामला हाई प्रोफाइल था और लोगों के मन में भी डर बैठ गया था।
अगर एक सामान्य और शांत जीवन जीने वाले प्रोफेसर और उनके परिवार के साथ ऐसा हो सकता है, तो फिर कोई भी परिवार सुरक्षित होने का दावा कैसे कर सकता है?
फिर बदली जांच की दिशा
आखिरकार इस पेचीदा मामले की जांच एक अनुभवी और जांबाज अधिकारी को सौंपी गई।
उन्होंने केस को शुरुआत से दोबारा समझना शुरू किया।
उन्होंने सिर्फ यह सवाल नहीं पूछा कि हत्या किसने की, बल्कि यह भी जानने की कोशिश की कि इस घर के बारे में सबसे ज्यादा जानकारी किस-किस व्यक्ति को थी?
कौन घर में आता-जाता था?
किसे परिवार की दिनचर्या पता थी?
किसे पता था कि घर में कौन किस समय मौजूद रहता है?
और वारदात के बाद कौन अचानक गायब हो गया?
जांच धीरे-धीरे एक नई दिशा में बढ़ने लगी।
जो सुराग इतने महीनों तक पुलिस की नजरों से बचा हुआ था, वही आगे चलकर इस पूरे हत्याकांड की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बनने वाला था।
जांच में सामने आया कि घर में काम करने वाली एक महिला भी थी, जिसे परिवार के बारे में काफी जानकारी थी। इसके बाद पुलिस ने उसकी गतिविधियों और उसके अचानक गायब होने को भी जांच के दायरे में लिया।
फिर जांच बेंगलुरु से हजारों किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल तक पहुंची।
एक ऐसी जगह, जहां आरोपी अपनी पहचान बदलकर रहने की कोशिश कर रहा था।
पुलिस जब इस परिवार तक पहुंची तो शुरुआत में पहचान छिपाने की कोशिश की गई। लेकिन तस्वीरों, सुरागों और लगातार पूछताछ के बाद आखिरकार वह राज खुल गया, जिसने पूरे मामले की दिशा बदल दी।
सालों बाद भी यह मामला इसलिए याद किया जाता है क्योंकि शुरुआत में जिस व्यक्ति पर पुलिस की नजर गई, जांच अंततः उससे कहीं अलग दिशा में पहुंची।
यह कहानी एक महत्वपूर्ण सबक भी देती है—किसी भी अपराध की जांच में सिर्फ शक के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचना खतरनाक हो सकता है। हर एंगल की जांच और ठोस साक्ष्यों के आधार पर सच तक पहुंचना ही सबसे जरूरी है।
और इस केस में सबसे बड़ा सवाल यही था—
आखिर वह कौन था, जिसे इस घर की इतनी जानकारी थी कि वारदात को अंजाम देने के बाद वह हजारों किलोमीटर दूर जाकर अपनी पहचान तक बदल सका?
इस सवाल का जवाब जब पुलिस को मिला, तो 10 महीने से उलझी हुई यह पहेली आखिरकार सुलझने लगी।
