बेंगलुरु के आरटी नगर इलाके में एक समय ऐसा हत्याकांड हुआ था, जिसने पुलिस से लेकर आम लोगों तक हर किसी को हैरान कर दिया था। घर के अंदर एक के बाद एक तीन लोगों की मौत हो गई थी। मरने वालों में गणित के विद्वान प्रोफेसर पुरुषोत्तम लाल सचदेवा, उनकी पत्नी रीता और उनका 35 वर्षीय विशेष जरूरतों वाला बेटा दीपक शामिल था।
सबसे बड़ा सवाल यह था कि आखिर इस परिवार को किसने और क्यों खत्म किया?
पुलिस की शुरुआती जांच की दिशा जिस शख्स की तरफ गई, वह कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि परिवार का ही सदस्य था। यह था अनुराग, जिसे प्रोफेसर पुरुषोत्तम लाल सचदेवा और उनकी पत्नी रीता ने अपने भतीजे को गोद लेकर बेटा बनाया था।
अनुराग पर शक की सबसे बड़ी वजह थी संपत्ति। पुलिस को आशंका थी कि कहीं परिवार के तीन सदस्यों की हत्या के पीछे संपत्ति हासिल करने का लालच तो नहीं था। लिहाजा अनुराग से लगातार पूछताछ शुरू हुई। अलग-अलग एंगल से जांच की गई, लेकिन करीब 10 महीने की पूछताछ के बावजूद पुलिस को उसके खिलाफ ऐसा ठोस सबूत नहीं मिला, जिससे उसे हत्याओं का जिम्मेदार ठहराया जा सके।
मामला लगातार उलझता जा रहा था।
केस क्राइम ब्रांच को सौंपा गया
जब शुरुआती जांच से हत्या की गुत्थी नहीं सुलझी तो मामले की जिम्मेदारी क्राइम ब्रांच के अधिकारी सी. डब्ल्यू. पुया को सौंपी गई। इसके बाद जांच की दिशा ही बदल गई।
सी. डब्ल्यू. पुया ने केस को शुरुआत से दोबारा देखना शुरू किया। उनका सवाल सीधा था—अगर अनुराग ने हत्या नहीं की, तो फिर इस घर के बारे में किसे-किसे जानकारी थी?
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि प्रोफेसर के घर में एक हाउसमेड भी काम करती थी। उसका नाम था सुचित्रा हलदार।
अब पुलिस ने सुचित्रा के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। लेकिन एक बात ने जांच अधिकारियों का ध्यान खींच लिया। परिवार के तीन सदस्यों की मौत के बाद सुचित्रा इलाके में दिखाई नहीं दी थी। इतना ही नहीं, जिन लोगों के यहां वह काम करती थी, उन्होंने भी सुचित्रा और उसके पति दीपक हलदार से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन दोनों के फोन नहीं लग रहे थे।
यहीं से पुलिस को एक नई कड़ी मिली।

सुचित्रा अचानक कहां गायब हो गई?
पुलिस ने सुचित्रा और उसके पति दीपक के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। जांच में पता चला कि सुचित्रा मूल रूप से पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना इलाके से जुड़ी हुई थी।
सी. डब्ल्यू. पुया और उनकी टीम पश्चिम बंगाल पहुंची। लेकिन जांच अधिकारी के सामने एक बड़ी चुनौती थी—सुचित्रा और उसका परिवार आखिर कहां मिलेगा?
कहानी के मुताबिक, जांच अधिकारी ने सुचित्रा, उसके पति और उनकी करीब पांच साल की बेटी की तस्वीर हासिल की। इसके बाद इलाके के स्कूलों में जाकर उस बच्ची की तस्वीर दिखाई गई और उसके बारे में जानकारी जुटाई गई।
काफी प्रयास के बाद एक स्कूल से पुलिस को अहम सुराग मिला। बताया गया कि तस्वीर में दिखाई देने वाली बच्ची वहां पढ़ती है।
अब पुलिस उस बच्ची के घर तक पहुंच गई।
नाम बदलकर रह रहा था परिवार
जब पुलिस बच्ची के माता-पिता के सामने पहुंची तो उन्होंने अपना नाम सुचित्रा और दीपक बताने से इनकार कर दिया। उन्होंने बताया कि उनका नाम राहुल और सुजाता है।
लेकिन जांच अधिकारी को यह बात संदिग्ध लगी।
पुलिस को पहले से ही इन दोनों के बारे में जानकारी थी और तस्वीरों से भी काफी चीजें मेल खा रही थीं। पूछताछ आगे बढ़ी तो पुलिस का शक और मजबूत होता गया।
कड़ी पूछताछ के बाद आखिरकार दोनों ने कथित तौर पर अपनी पहचान स्वीकार कर ली। महिला ने माना कि वह सुचित्रा हलदार है और उसके पति ने भी खुद को दीपक हलदार बताया।
इसके बाद पुलिस के सामने जो कहानी सामने आई, उसने पूरे हत्याकांड को नया मोड़ दे दिया।
पुलिस के मुताबिक मेड ने सुनाई हत्या की कहानी
जांच में सामने आए कथित बयान के मुताबिक, 15 फरवरी की सुबह सुचित्रा रोज की तरह प्रोफेसर पुरुषोत्तम लाल सचदेवा के घर पहुंची थी। लेकिन उस दिन वह अकेली नहीं थी। उसके साथ उसका पति दीपक हलदार और उसके दो साथी भी थे।
सुचित्रा ने दरवाजे की घंटी बजाई। घर की मालकिन रीता ने दरवाजा खोला।
पुलिस के मुताबिक, इसके बाद आरोपियों ने सबसे पहले रीता पर हमला किया। कथित तौर पर गला दबाकर उनकी हत्या कर दी गई।
इसके बाद आरोपी पुरुषोत्तम लाल सचदेवा के कमरे में पहुंचे। पुलिस के अनुसार, उनकी भी गला दबाकर हत्या कर दी गई।
हत्याकांड के बाद घर से कथित तौर पर जेवरात और अन्य सामान लिया गया।
लेकिन जाते-जाते आरोपियों ने परिवार के तीसरे सदस्य दीपक को भी नहीं छोड़ा। पुलिस के मुताबिक, चार्जर के तार का इस्तेमाल कर उसकी भी हत्या कर दी गई।
इस तरह एक ही घर में तीन लोगों की जान चली गई।
10 महीने तक गलत दिशा में चलती रही जांच?
इस मामले की सबसे हैरान करने वाली बात यही रही कि शुरुआती जांच में पुलिस का शक परिवार के गोद लिए बेटे अनुराग पर था। करीब 10 महीने तक उससे पूछताछ होती रही। लेकिन उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत सामने नहीं आए।
बाद में जांच की दिशा घर में काम करने वाली मेड सुचित्रा की तरफ गई और फिर उसके पति तक पुलिस पहुंची।
यह मामला सिर्फ एक हत्याकांड की कहानी नहीं है, बल्कि पुलिस जांच में छोटी-सी कड़ी की अहमियत भी बताता है। अगर सुचित्रा के अचानक गायब होने और उसके पति के फोन बंद होने वाली कड़ी को नजरअंदाज कर दिया जाता, तो शायद जांच किसी और दिशा में चलती रहती।
हालांकि, किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने का अंतिम फैसला अदालत ही करती है। पुलिस की जांच और कथित कबूलनामे के अलावा मामले में सामने आए अन्य साक्ष्यों और अदालत के निष्कर्ष को भी देखना जरूरी है।
लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया—क्या घर में काम करने वाले हर व्यक्ति पर शक किया जाना चाहिए?
इसका जवाब बिल्कुल सीधा नहीं है। लाखों परिवारों में घरेलू कर्मचारी वर्षों तक परिवार का हिस्सा बनकर रहते हैं और उनके साथ भरोसे का रिश्ता होता है। किसी एक आपराधिक घटना के आधार पर हर घरेलू कर्मचारी को संदेह की नजर से देखना उचित नहीं होगा।
हां, यह घटना परिवारों को सुरक्षा को लेकर सतर्क जरूर करती है। कर्मचारियों की पहचान और पृष्ठभूमि का सत्यापन, घर की सुरक्षा व्यवस्था और संवेदनशील जानकारी तक सीमित पहुंच जैसी सावधानियां किसी भी परिवार के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
और इस हत्याकांड की सबसे बड़ी पहेली यही रही—जिस व्यक्ति पर 10 महीने तक शक किया गया, वह आखिरकार आरोपी नहीं निकला और जांच उस व्यक्ति तक पहुंची, जिसके पास घर के अंदर जाने और परिवार की दिनचर्या की जानकारी थी।
एक परिवार खत्म हो गया, एक गोद लिया बेटा लंबे समय तक शक के घेरे में रहा और पुलिस को सच्चाई तक पहुंचने में महीनों लग गए।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हत्याकांड का मास्टरमाइंड कौन था, बल्कि यह भी है कि आखिर लालच इंसान को किस हद तक ले जा सकता है?
