खगड़िया, बिहार: बिहार के खगड़िया जिले से सामने आई मनीष कुमार गुप्ता उर्फ ‘चिक्कू’ की कहानी ने फर्जी पहचान, रसूख और कथित ठगी के एक ऐसे खेल पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें एक शख्स ने कथित तौर पर खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय यानी PMO का बड़ा अधिकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट बताकर लोगों के बीच अपनी धाक जमाई। आरोप है कि इसी कथित पहचान के सहारे उसने लोगों से नौकरी, ट्रांसफर और अन्य सरकारी काम कराने के नाम पर पैसे वसूले और देखते ही देखते करोड़ों की संपत्ति खड़ी कर ली।
हालांकि, इस पूरे मामले में सामने आने वाले दावों और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर होना जरूरी है। यह लेख उपलब्ध जानकारी और लगाए गए आरोपों के आधार पर तैयार किया गया है।
प्रोफेसर का बेटा, पढ़ाई में था होनहार
बताया जाता है कि मनीष कुमार गुप्ता मूल रूप से बिहार के खगड़िया जिले के रहने वाले हैं। उनके पिता खगड़िया के केडीएस इंटर कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर थे। परिवार में कुल छह भाई थे और मनीष सबसे छोटे बताए जाते हैं। परिवार में शिक्षा का माहौल होने के कारण सभी भाइयों की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया गया।
जानकारी के मुताबिक, मनीष के बड़े भाई संजय दिल्ली में प्रोफेसर हैं, जबकि एक भाई कनाडा में नौकरी करता है। परिवार के अन्य सदस्य भी अच्छे पदों पर बताए जाते हैं। मनीष भी पढ़ाई में काफी होनहार थे। दावा है कि वर्ष 1991 में उन्होंने खगड़िया जिले में दसवीं की परीक्षा में टॉप किया था।
दसवीं के बाद उन्होंने खगड़िया में ही 12वीं तक पढ़ाई की और फिर UPSC की तैयारी करने के लिए दिल्ली चले गए। लेकिन कथित तौर पर उनका UPSC में चयन नहीं हो सका।
UPSC में सफलता नहीं मिली तो बदल गई कहानी?
आरोपों के मुताबिक, UPSC में सफलता नहीं मिलने के बाद मनीष वापस खगड़िया लौट आए। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से दूरी बनानी शुरू कर दी। बताया जाता है कि वह लोगों के सवालों से बचना चाहते थे कि आखिर UPSC में उनका क्या हुआ।
इसी दौरान कथित तौर पर उन्होंने लोगों को यह बताना शुरू किया कि वह प्रधानमंत्री कार्यालय में एक बड़े अधिकारी के तौर पर तैनात हैं। इतना ही नहीं, आरोप है कि वह खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का अंडरकवर एजेंट और सीधे प्रधानमंत्री से संपर्क रखने वाला अधिकारी भी बताता था।
कथित तौर पर लोगों के बीच अपनी पहचान मजबूत करने के लिए उसने एक फर्जी केंद्रीय सतर्कता आयोग यानी CVC प्रमाणपत्र भी तैयार करवाया और उसे लोगों को दिखाता था।
किराए की गाड़ी पर लाल बत्ती और बढ़ता रसूख
कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा तब सामने आता है, जब आरोप है कि मनीष ने अपने कथित सरकारी रसूख का प्रभाव पैदा करने के लिए किराए की गाड़ी का इस्तेमाल किया और उस पर लाल बत्ती लगाकर घूमने लगा।
इसके बाद लोगों को लगने लगा कि उसका संपर्क बड़े अधिकारियों और नेताओं से है और वह सरकारी विभागों में किसी का भी काम करवा सकता है। धीरे-धीरे लोग नौकरी, ट्रांसफर और अन्य सरकारी कामों के लिए उसके पास पहुंचने लगे।
आरोप है कि यहीं से कथित तौर पर पैसे लेने का खेल शुरू हुआ। बताया जाता है कि अगर किसी व्यक्ति से 10 लाख रुपये लिए जाते तो उसमें से कथित तौर पर कुछ रकम संबंधित अधिकारी तक पहुंचाने और बाकी रकम अपने पास रखने का दावा किया जाता था।
इसी तरीके से बड़ी रकम जुटाने का आरोप मनीष पर लगाया गया है।
आलीशान बंगला और Tesla कार
दावे के मुताबिक, कथित कमाई के बाद मनीष ने खगड़िया में जमीन खरीदी और उस पर बेहद आलीशान इंटीरियर वाला घर तैयार करवाया। सोशल मीडिया और वायरल दावों में इस घर की तुलना बड़े उद्योगपतियों के आलीशान घरों के इंटीरियर से की जाती रही है।

इसके अलावा मनीष के पास Tesla कार होने की बात भी सामने आई। उनकी लाइफस्टाइल, महंगी कार और कथित संपत्तियों को देखकर लोगों के बीच उनके रसूख को लेकर चर्चा बढ़ती गई।
आरोप यह भी है कि बिहार के अलावा देश के दूसरे बड़े शहरों और विदेशों में भी उनके नाम से संपत्तियां मौजूद हैं। हालांकि इन संपत्तियों की वास्तविक संख्या, कीमत और स्वामित्व से जुड़ी जानकारी की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।
शिकायत के बाद पुलिस की कार्रवाई
बताया जाता है कि मामला तब सामने आया जब खगड़िया पुलिस के शिकायत तंत्र के माध्यम से मनीष कुमार गुप्ता के खिलाफ शिकायत पहुंची। इसके बाद खगड़िया के एसपी भानु प्रताप सिंह के नेतृत्व में पुलिस टीम द्वारा कार्रवाई किए जाने की बात कही गई।
पुलिस टीम कथित तौर पर मनीष के आलीशान घर तक पहुंची। कार्रवाई के दौरान जब पुलिस ने उन्हें थाने चलने के लिए कहा तो उनकी Tesla कार को लेकर भी एक कथित बातचीत सामने आई।
दावे के मुताबिक, पुलिस द्वारा कार की पिछली सीट पर बैठने के लिए कहे जाने पर मनीष ने कथित तौर पर सवाल किया कि वह अपनी ही कार में पीछे क्यों बैठें और उन्हें कार चलाने का तरीका पता है। इस घटना को उनके कथित आत्मविश्वास और रसूख से जोड़कर देखा जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल: आखिर कितनी बड़ी थी पूरी कहानी?
मनीष कुमार गुप्ता की कहानी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। अगर किसी व्यक्ति पर फर्जी सरकारी पहचान बनाकर लोगों को प्रभावित करने और उनसे पैसे लेने के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की ठगी का मामला नहीं होगा, बल्कि यह सरकारी संस्थाओं और उनके नाम के दुरुपयोग का भी गंभीर उदाहरण माना जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कथित तौर पर एक फर्जी पहचान के सहारे कोई व्यक्ति इतने लंबे समय तक लोगों के बीच सरकारी अधिकारी के रूप में अपनी पहचान कैसे बनाए रख सकता है? उसके पास मौजूद दस्तावेजों की जांच क्यों नहीं हुई? उसके कथित रसूख से प्रभावित होकर लोग कितनी रकम तक देते रहे? और यदि इतने वर्षों तक उसकी गतिविधियां चलती रहीं तो संबंधित एजेंसियों को इसकी भनक पहले क्यों नहीं लगी?
इस पूरे मामले की सच्चाई अब पुलिस जांच और आधिकारिक दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकेगी। यदि आरोप साबित होते हैं तो यह मामला उन लोगों के लिए भी बड़ा सबक होगा जो किसी व्यक्ति के सरकारी संपर्क और प्रभाव के दावे पर भरोसा करके लाखों रुपये दे देते हैं।
फिलहाल मनीष कुमार गुप्ता उर्फ ‘चिक्कू’ की कहानी ने बिहार से लेकर सोशल मीडिया तक काफी चर्चा पैदा कर दी है। लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच और अदालत की प्रक्रिया के बाद ही निकाला जाना
