तेरा मेरा प्यार अमर, फिर क्यों मुझको लगता है डर…
यह गीत सुनते ही हिंदी सिनेमा के उस दौर की याद ताजा हो जाती है, जब पर्दे पर एक बेहद खूबसूरत चेहरा लोगों के दिलों पर राज करता था। वह चेहरा था साधना शिवदासानी का। अपने दौर में साधना सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं थीं, बल्कि एक फैशन आइकन और बॉलीवुड की सबसे चर्चित अदाकाराओं में शामिल थीं।

जिस अभिनेत्री के हेयरस्टाइल की नकल पूरे देश में होने लगी थी, जिसकी खूबसूरती के चर्चे हर तरफ थे और जिसने वो कौन थी?, मेरा साया, वक्त, आरज़ू, मेरे महबूब और लव इन शिमला जैसी फिल्मों से अपनी पहचान बनाई, उसी साधना ने अपने जीवन के आखिरी वर्षों में लाइमलाइट से लगभग पूरी तरह दूरी बना ली थी।
कराची से मुंबई तक का सफर
साधना शिवदासानी का जन्म 2 सितंबर 1941 को कराची में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार कराची छोड़कर मुंबई आ गया। साधना का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने पढ़ाई की और अभिनय की दुनिया में अपनी जगह बनाने का सपना देखा।
उनका शुरुआती फिल्मी सफर 1955 की श्री 420 से जुड़ा, जिसमें उन्होंने बिना क्रेडिट के एक छोटी भूमिका निभाई। इसके बाद उन्हें फिल्मों में आगे बढ़ने के मौके मिलने लगे। आखिरकार 1960 में आई लव इन शिमला ने उनकी जिंदगी बदल दी। इस फिल्म में वह मुख्य भूमिका में नजर आईं और फिल्म की सफलता के साथ साधना रातोंरात स्टार बन गईं।
‘साधना कट’ बना फैशन का जुनून
साधना की खूबसूरती के साथ उनका हेयरस्टाइल भी उनकी पहचान बन गया। उनके माथे पर गिरती छोटी फ्रिंज वाला हेयरकट इतना लोकप्रिय हुआ कि उसे ही बाद में ‘साधना कट’ कहा जाने लगा।
उस दौर में लड़कियां साधना जैसा हेयरस्टाइल अपनाने लगी थीं। उनकी खूबसूरती, आंखों का अंदाज और पर्दे पर उनकी मौजूदगी ने उन्हें हिंदी सिनेमा की सबसे अलग अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया।
इसके बाद परख, हम दोनों, असली-नकली, एक मुसाफिर एक हसीना, मेरे महबूब, वक्त, आरज़ू, वो कौन थी? और मेरा साया जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को और मजबूत किया। वो कौन थी? में मनोज कुमार के साथ उनका रहस्यमयी किरदार बेहद लोकप्रिय हुआ और फिल्म की सफलता के बाद साधना को सस्पेंस फिल्मों की ‘मिस्ट्री गर्ल’ के रूप में भी पहचान मिली।
प्यार हुआ और शादी तक पहुंची कहानी
साधना की जिंदगी में निर्देशक आर.के. नय्यर का भी खास स्थान रहा। लव इन शिमला के दौरान दोनों करीब आए और बाद में दोनों ने शादी कर ली। साधना और आर.के. नय्यर ने 7 मार्च 1966 को शादी की थी। दोनों करीब तीन दशक तक साथ रहे। उनकी कोई संतान नहीं थी।
लेकिन जिंदगी हमेशा फिल्मी कहानी की तरह खूबसूरत नहीं रहती। साधना के जीवन में भी ऐसे दौर आए, जिन्होंने उन्हें धीरे-धीरे पर्दे से दूर कर दिया।
बीमारी ने बदली जिंदगी
1960 के दशक के आखिरी वर्षों में साधना की तबीयत खराब रहने लगी। उन्हें हाइपरथायरॉइडिज्म की समस्या हुई और इसके कारण उनकी आंखों से जुड़ी परेशानियां भी बढ़ीं। इलाज के लिए उन्हें अमेरिका के बोस्टन तक जाना पड़ा। कुछ समय के ब्रेक के बाद उन्होंने फिल्मों में वापसी भी की और एक फूल दो माली तथा इंतकाम जैसी फिल्मों में नजर आईं।
बाद के वर्षों में साधना ने फिल्मों से धीरे-धीरे दूरी बनानी शुरू कर दी। 1974 में उन्होंने गीता मेरा नाम के जरिए निर्देशन में भी हाथ आजमाया। इसके बाद उनका फिल्मी करियर लगभग समाप्त हो गया। उनकी अंतिम स्क्रीन उपस्थिति उल्फत की नई मंजिलें में रही, जो लंबे समय बाद 1994 में रिलीज हुई।
बबीता से रिश्ते को लेकर भी रही चर्चा
साधना का नाम अक्सर कपूर परिवार से जुड़े उनके रिश्ते के कारण भी चर्चा में आया। बबीता उनकी पहली कजिन थीं और बाद में वह कपूर परिवार की बहू बनीं। हालांकि दोनों के बीच बाद के वर्षों में दूरी रही।
लेकिन यह कहना कि साधना की पूरी जिंदगी की परेशानी या उनकी ‘बर्बादी’ की जिम्मेदार सिर्फ बबीता थीं, उपलब्ध तथ्यों से साबित नहीं होता। खुद साधना ने एक समय कहा था कि वह बबीता के संपर्क में नहीं थीं। इसलिए इस रिश्ते को उनके जीवन की एक निजी और जटिल घटना के तौर पर देखना ज्यादा उचित है, न कि उनकी जिंदगी की सारी परेशानियों का एकमात्र कारण मानना।
जिस चेहरे से दुनिया प्यार करती थी, उससे साधना ने बना ली दूरी
साधना के जीवन का सबसे भावुक पहलू यह रहा कि जिस चेहरे ने कभी लाखों लोगों को अपना दीवाना बनाया था, उसी चेहरे को उन्होंने सार्वजनिक नजरों से दूर कर लिया।
हाइपरथायरॉइडिज्म से जुड़ी आंखों की समस्याओं और निजी जिंदगी की परिस्थितियों के कारण उन्होंने फोटो खिंचवाने और सार्वजनिक कार्यक्रमों में आने से काफी हद तक दूरी बना ली थी। लंबे समय तक वह मुंबई में अपेक्षाकृत शांत जीवन जीती रहीं।
2014 में अभिनेत्री नंदा के निधन के बाद साधना फिर कभी-कभार सार्वजनिक जीवन में नजर आईं। बाद में वह एक चैरिटी फैशन शो में रणबीर कपूर के साथ रैंप पर भी दिखाई दीं। यह उनके अंतिम सार्वजनिक मौकों में से एक माना जाता है।
25 दिसंबर 2015 को हमेशा के लिए खामोश हो गईं
25 दिसंबर 2015 को साधना शिवदासानी का निधन हो गया। वह अपने पीछे फिल्मों की ऐसी विरासत छोड़ गईं, जिसे हिंदी सिनेमा कभी भुला नहीं सकता।
साधना की कहानी सिर्फ एक फिल्म अभिनेत्री की कहानी नहीं है। यह उस दौर की उस लड़की की कहानी है जिसने कराची से मुंबई तक का सफर तय किया, फिल्मों में कदम रखा, अपनी खूबसूरती और अभिनय से करोड़ों दिल जीते, अपना एक अलग फैशन ट्रेंड बनाया और फिर जिंदगी के उतार-चढ़ाव के बीच धीरे-धीरे दुनिया की चकाचौंध से दूर होती चली गई।
आज भी जब तेरा मेरा प्यार अमर या लग जा गले जैसे गीत बजते हैं, तो लोगों को साधना का वही खूबसूरत चेहरा याद आता है।
साधना पर्दे से भले ही दूर हो गईं, लेकिन हिंदी सिनेमा के इतिहास में उनका सितारा आज भी उतना ही चमकता है।
