कानपुर में बैंक लॉकर से करीब 50 लाख रुपये के सोने-चांदी के जेवर गायब होने का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने बैंक लॉकर की सुरक्षा और बैंक कर्मचारियों की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कौशलपुरी निवासी 55 वर्षीय रश्मि अरोड़ा का दावा है कि उन्होंने साल 2003 में तत्कालीन स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर यानी SBT की स्वरूप नगर शाखा में लॉकर नंबर 23 लिया था और उसमें करीब 50 लाख रुपये के जेवर रखे थे। लेकिन जब जुलाई 2026 में उन्होंने वर्षों बाद अपना लॉकर खोला तो अंदर एक भी जेवर नहीं था। मामले में पुलिस ने बैंक मैनेजर और कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

2003 में लॉकर में रखे थे लाखों के जेवर
रश्मि अरोड़ा के मुताबिक, 26 फरवरी 2003 को उन्होंने अपने पति के साथ स्वरूप नगर स्थित तत्कालीन State Bank of Travancore में बचत खाता खुलवाया था। इसी दौरान उन्हें लॉकर नंबर 23 आवंटित किया गया। उनका दावा है कि उन्होंने इस लॉकर में करीब 50 लाख रुपये मूल्य के सोने और चांदी के पुश्तैनी आभूषण रखे थे।
शुरुआती वर्षों में रश्मि समय-समय पर कानपुर जाकर लॉकर को चेक भी करती थीं। यानी उन्हें भरोसा था कि बैंक का लॉकर उनके परिवार की वर्षों की जमा पूंजी और पुश्तैनी गहनों को सुरक्षित रखेगा।
लेकिन फिर उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया।
पति की मौत के बाद लखनऊ चली गईं रश्मि
साल 2011 में रश्मि अरोड़ा के पति का निधन हो गया। इसके बाद उनकी तबीयत भी खराब रहने लगी। उनकी बेटी उन्हें अपने साथ लखनऊ के आलमबाग ले गईं। धीरे-धीरे कानपुर आना कम हो गया और बैंक लॉकर भी लंबे समय तक नहीं खुल पाया।
रश्मि का कहना है कि इसके बावजूद उनका बैंक खाता चलता रहा और लॉकर से जुड़े शुल्क की कटौती भी होती रही। इसलिए उन्हें यह चिंता नहीं थी कि उनका लॉकर बंद हो गया होगा या उसमें रखे जेवरों को लेकर कोई समस्या पैदा हो सकती है।
2026 में बैंक पहुंचीं तो सामने आया पहला बड़ा झटका
करीब चार महीने पहले रश्मि अपनी बेटी के साथ दोबारा कानपुर की उसी बैंक शाखा में पहुंचीं। वहां उन्हें पता चला कि जिस State Bank of Travancore में उन्होंने लॉकर लिया था, उसका बाद में State Bank of India यानी SBI में विलय हो चुका है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि SBT समेत कई सहयोगी बैंकों का SBI में विलय 2017 में प्रभावी हुआ था, न कि 2013 में।
रश्मि जब SBI शाखा पहुंचीं तो कथित तौर पर शुरुआत में उन्हें बताया गया कि उनके नाम पर कोई लॉकर रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है। रश्मि ने जब पुराने दस्तावेज और बैंक से संबंधित रिकॉर्ड दिखाए तो बैंक अधिकारियों ने रिकॉर्ड खंगालना शुरू किया। बाद में लॉकर नंबर 23 की जानकारी सामने आई।
27 जुलाई को खुला लॉकर और उड़ गए होश
रश्मि ने बैंक से अपने लॉकर की जानकारी मिलने के बाद उसे खोलने की प्रक्रिया पूरी की। 27 जुलाई 2026 को जब लॉकर खोला गया तो रश्मि के होश उड़ गए।
लॉकर पूरी तरह खाली था।
जिस लॉकर में रश्मि के मुताबिक करीब 50 लाख रुपये के सोने-चांदी के आभूषण रखे थे, वहां एक भी जेवर मौजूद नहीं था।
रश्मि के सामने सबसे बड़ा सवाल था—अगर मैंने लॉकर नहीं खोला तो मेरे जेवर गए कहां?
बैंक से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के बाद उन्होंने पुलिस से शिकायत की और बैंक प्रबंधन तथा कर्मचारियों पर लापरवाही और गहनों के गायब होने का आरोप लगाया। पुलिस कमिश्नर के आदेश के बाद स्वरूप नगर पुलिस ने बैंक मैनेजर और कर्मचारियों के खिलाफ केस दर्ज किया।
2020 का रिकॉर्ड इस मामले को और रहस्यमय बनाता है
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल अब साल 2020 को लेकर खड़ा हो गया है।
स्वरूप नगर थाना प्रभारी देवेंद्र सिंह के मुताबिक, बैंक के रिकॉर्ड में यह दर्ज है कि लॉकर धारक ने 2020 में दो बार लॉकर खोलने के लिए बैंक का दौरा किया था। पुलिस इस रिकॉर्ड की जांच कर रही है।
यही बात अब जांच का अहम हिस्सा बन गई है।
अगर रश्मि अरोड़ा का कहना है कि उन्होंने लंबे समय से लॉकर संचालित नहीं किया था, तो फिर बैंक रिकॉर्ड में 2020 में लॉकर खोलने की एंट्री कैसे हुई? क्या वास्तव में रश्मि बैंक गई थीं? अगर नहीं गई थीं तो लॉकर किसने और किस प्रक्रिया के तहत खोला? क्या बैंक के पास उस समय के एक्सेस रिकॉर्ड, रजिस्टर, सीसीटीवी फुटेज या अन्य दस्तावेज मौजूद हैं?
इन सवालों के जवाब पुलिस जांच के बाद ही सामने आएंगे।
क्या बैंक सिर्फ 5 लाख रुपये ही देगा?
इस मामले में सोशल मीडिया और कई रिपोर्टों में RBI के नियमों के तहत मुआवजे को लेकर चर्चा हो रही है।
RBI के 18 अगस्त 2021 के संशोधित निर्देशों के मुताबिक, अगर बैंक परिसर में चोरी, डकैती, आग जैसी घटना या बैंक कर्मचारी की धोखाधड़ी के कारण लॉकर की सामग्री का नुकसान होता है, तो बैंक की देनदारी लॉकर के प्रचलित वार्षिक किराये की 100 गुना राशि तक हो सकती है। ये संशोधित निर्देश 1 जनवरी 2022 से नए और मौजूदा दोनों लॉकरों पर लागू हुए।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में बैंक स्वतः सिर्फ 100 गुना किराये की राशि देकर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगा। इस मामले में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जांच में बैंक की गलती, कर्मचारी की धोखाधड़ी या किसी अन्य परिस्थिति की क्या भूमिका सामने आती है।
मसलन, यदि किसी लॉकर का संबंधित वार्षिक किराया ₹5,000 माना जाए तो 100 गुना राशि ₹5 लाख बनती है। लेकिन वास्तविक मुआवजा और बैंक की कानूनी देनदारी इस मामले के तथ्यों, बैंक के अनुबंध और जांच के परिणाम पर निर्भर करेगी।
सबसे बड़ा सवाल—आखिर 50 लाख के जेवर गए कहां?
रश्मि अरोड़ा के लिए यह सिर्फ पैसे का मामला नहीं है। उनके मुताबिक लॉकर में रखे जेवरों की कीमत करीब 50 लाख रुपये थी और उनमें पुश्तैनी गहने भी शामिल थे।
अब पुलिस बैंक के लॉकर रिकॉर्ड, एक्सेस रजिस्टर, संबंधित दस्तावेज और उपलब्ध CCTV फुटेज की जांच कर रही है। बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों से भी पूछताछ की जा सकती है।
फिलहाल FIR दर्ज होना यह साबित नहीं करता कि बैंक कर्मचारी दोषी हैं। दोष साबित होना जांच और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
लेकिन इस मामले ने एक बेहद अहम सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—अगर कोई व्यक्ति बैंक के लॉकर को सबसे सुरक्षित जगह मानकर अपने जीवनभर की कमाई और पुश्तैनी गहने उसमें रखता है, तो आखिर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
रश्मि अरोड़ा के लॉकर नंबर 23 का रहस्य अब पुलिस जांच के हाथ में है। करीब 23 साल पुराने इस लॉकर से 50 लाख रुपये के जेवर आखिर कब और कैसे गायब हुए, और 2020 में दर्ज लॉकर एक्सेस का सच क्या है—इन सवालों के जवाब सामने आने का इंतजार है।
