ममता बनर्जी: एक आंदोलनकारी लड़की जिसने 34 साल पुराना लाल किला गिरा दिया
साल 1975। देश में आपातकाल लागू था। राजनीति दो हिस्सों में बंट चुकी थी। एक तरफ इंदिरा गांधी और कांग्रेस का समर्थन करने वाले लोग थे, तो दूसरी ओर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में खड़ा विपक्ष। इसी दौर में कोलकाता की सड़कों पर एक युवा लड़की अचानक राष्ट्रीय राजनीति की चर्चा बन गई।
जेपी की रैली रोकने के लिए सड़क पर लेट जाने वाली वह लड़की आगे चलकर भारत की पहली महिला रेल मंत्री बनी, पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी और 34 साल पुराने वामपंथी शासन को खत्म कर देने वाली सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत भी। उस लड़की का नाम था — ममता बनर्जी।
साधारण परिवार से राजनीति तक का सफर

5 जनवरी 1955 को वीरभूम जिले में जन्मी ममता बनर्जी का पालन-पोषण कोलकाता के कालीघाट इलाके में हुआ। उनका परिवार शुरू से कांग्रेस विचारधारा से जुड़ा था। पिता प्रोमलेश्वर बनर्जी कांग्रेस कार्यकर्ता थे। लेकिन जब ममता मात्र 17 साल की थीं, तभी पिता का निधन हो गया। परिवार आर्थिक संकट में डूब गया।
इसी दौर में ममता ने जिम्मेदारियों के साथ पढ़ाई और राजनीति दोनों संभालीं। सुबह 3:30 बजे उठकर घर का काम करना, परिवार के लिए खाना बनाना और फिर कॉलेज जाना उनकी दिनचर्या बन चुकी थी।
कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वह पश्चिम बंगाल छात्र परिषद से जुड़ीं, जो कांग्रेस का छात्र संगठन था। यहीं से उन्होंने वामपंथी राजनीति के खिलाफ खुलकर संघर्ष शुरू किया।
जेपी आंदोलन के खिलाफ सड़कों पर उतरीं ममता
आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण देशभर में कांग्रेस विरोधी आंदोलन चला रहे थे। 25 अगस्त 1975 को जब जेपी कोलकाता पहुंचे, तब कांग्रेस समर्थकों ने उनका विरोध किया।
इसी विरोध प्रदर्शन में ममता बनर्जी ने जेपी के काफिले को रोका। कहा जाता है कि वह जेपी की कार के सामने सड़क पर लेट गईं और फिर कार के बोनट पर चढ़कर नारेबाजी की। इस घटना की तस्वीरें दिल्ली तक पहुंचीं और कांग्रेस नेतृत्व की नजर ममता पर पड़ी।
मोरारजी देसाई को दिखाया काला झंडा
1977 में इमरजेंसी खत्म हुई और जनता पार्टी की सरकार बनी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जब वह कोलकाता पहुंचे तो ममता बनर्जी ने पुलिस सुरक्षा को चकमा देकर उनके काफिले के सामने काला झंडा लहरा दिया।
अब कांग्रेस समझ चुकी थी कि ममता में आक्रामक जननेता बनने की क्षमता है। जल्द ही उन्हें छात्र परिषद की वर्किंग कमेटी में जगह मिली और फिर संगठन में लगातार बड़े पद मिलने लगे।

1984: सोमनाथ चटर्जी को हराकर बनीं सबसे युवा सांसद
1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने ममता बनर्जी को जाधवपुर सीट से मैदान में उतारा। सामने थे सीपीएम के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी।
सफेद साड़ी और रबर की चप्पल पहनकर घर-घर वोट मांगने वाली ममता को शुरुआत में हल्के में लिया गया। लेकिन चुनाव परिणाम ने सबको चौंका दिया। ममता ने लगभग 20 हजार वोटों से सोमनाथ चटर्जी को हराकर इतिहास रच दिया और उस समय की सबसे युवा सांसद बनीं।
यहीं से उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई शुरू हुई — सीपीएम के खिलाफ।
1990: जब ममता पर हुआ जानलेवा हमला
16 अगस्त 1990 को कोलकाता के हजरा मोड़ पर किराया वृद्धि के खिलाफ कांग्रेस प्रदर्शन कर रही थी। इसी दौरान हिंसा भड़क गई।
ममता बनर्जी पर लोहे की रॉड से हमला किया गया। उनके सिर पर कई वार हुए। वह खून से लथपथ हो गईं। हमले की तस्वीरें अखबारों और टीवी में छा गईं। ममता ने इसे अपनी हत्या की साजिश बताया।
इस घटना ने उन्हें बंगाल की राजनीति में संघर्षशील नेता की पहचान दिला दी।
1990: जब ममता पर हुआ जानलेवा हमला
16 अगस्त 1990 को कोलकाता के हजरा मोड़ पर किराया वृद्धि के खिलाफ कांग्रेस प्रदर्शन कर रही थी। इसी दौरान हिंसा भड़क गई।
ममता बनर्जी पर लोहे की रॉड से हमला किया गया। उनके सिर पर कई वार हुए। वह खून से लथपथ हो गईं। हमले की तस्वीरें अखबारों और टीवी में छा गईं। ममता ने इसे अपनी हत्या की साजिश बताया।
इस घटना ने उन्हें बंगाल की राजनीति में संघर्षशील नेता की पहचान दिला दी।
कांग्रेस से बगावत और तृणमूल कांग्रेस का जन्म
90 के दशक में ममता लगातार आरोप लगाती रहीं कि बंगाल कांग्रेस सीपीएम के खिलाफ कमजोर रुख अपना रही है। पार्टी नेतृत्व से उनके मतभेद बढ़ते गए।
आखिरकार 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने नई पार्टी बनाने का ऐलान किया — ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस।
नई पार्टी बनने के तुरंत बाद हुए लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने 7 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखा दी।
अटल सरकार में रेल मंत्री बनीं ममता
1999 में ममता बनर्जी ने एनडीए का समर्थन किया और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री बनीं।
रेल मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने बंगाल के लिए कई परियोजनाओं की घोषणा की। उनकी छवि एक जुझारू लेकिन भावुक नेता की बन चुकी थी। कई बार संसद में उनका गुस्सा भी सुर्खियां बना।
सिंघूर आंदोलन: ममता की सबसे बड़ी राजनीतिक जीत
2006 में बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने टाटा नैनो फैक्ट्री के लिए सिंघूर में करीब 997 एकड़ जमीन अधिग्रहित की।
किसानों ने विरोध शुरू किया और ममता बनर्जी आंदोलन का चेहरा बन गईं। उन्होंने 26 दिन तक भूख हड़ताल की। पूरा बंगाल इस आंदोलन में बंट गया।
आखिरकार टाटा समूह ने बंगाल छोड़कर गुजरात में प्लांट लगाने का फैसला किया। यह ममता बनर्जी की सबसे बड़ी राजनीतिक जीत मानी गई।
नंदीग्राम ने बदल दी बंगाल की राजनीति

2007 में नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बड़ा आंदोलन हुआ। पुलिस फायरिंग में कई लोगों की मौत हुई। वाम सरकार पर हिंसा और दमन के आरोप लगे।
ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को पूरे बंगाल में उठाया। “मां, माटी, मानुष” का नारा लोगों के बीच लोकप्रिय हो गया।
यहीं से वामपंथी सरकार का पतन शुरू हो गया।
2011: 34 साल पुराना वाम किला ढह गया
13 मई 2011 को चुनाव परिणाम आए। तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
34 साल से सत्ता में बैठी लेफ्ट फ्रंट सरकार हार गई। खुद मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी सीट हार गए।
20 मई 2011 को ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वह पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सिंघूर के किसानों को जमीन लौटाने का फैसला लिया।
ममता बनर्जी क्यों बनीं बंगाल की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत?
ममता बनर्जी की राजनीति का आधार सिर्फ भाषण नहीं था। उनकी छवि सड़क पर लड़ने वाली नेता की रही। उन्होंने:
- सीपीएम के खिलाफ लगातार संघर्ष किया
- किसान आंदोलनों को नेतृत्व दिया
- खुद को गरीब और आम जनता की नेता के रूप में स्थापित किया
- बंगाल की क्षेत्रीय पहचान को मजबूत किया
इसी वजह से वह आज भी बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा मानी जाती हैं।
निष्कर्ष
ममता बनर्जी की कहानी सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब बंगाल में कम्युनिज्म का अंत हुआ और क्षेत्रीय राजनीति का नया अध्याय शुरू हुआ।
जेपी की कार रोकने वाली लड़की से लेकर 34 साल पुरानी वाम सरकार गिराने तक का सफर भारतीय राजनीति के सबसे बड़े राजनीतिक परिवर्तन में से एक माना जाता है।
