मुंबई: कभी रेमंड जैसी बड़ी कंपनी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले उद्योगपति विजयपत सिंघानिया की जिंदगी का आखिरी दौर बेहद भावुक और संघर्षपूर्ण रहा। एक समय वह मुंबई की आलीशान 37 मंजिला जेके हाउस इमारत से जुड़े अपने शानदार जीवन के लिए जाने जाते थे, लेकिन बाद के वर्षों में पिता-पुत्र के बीच संपत्ति और कारोबार को लेकर विवाद ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। 28 मार्च 2026 को 87 वर्ष की उम्र में मुंबई में उनका निधन हो गया। उनके बेटे गौतम सिंघानिया ने सोशल मीडिया पर उनके निधन की जानकारी दी।
विजयपत सिंघानिया सिर्फ एक बड़े कारोबारी ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने रेमंड ग्रुप को देश के प्रमुख ब्रांडों में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने करीब दो दशकों तक रेमंड का नेतृत्व किया और कंपनी के कारोबार को कपड़ों और टेक्सटाइल से आगे कई क्षेत्रों तक विस्तार देने में भूमिका निभाई। उन्हें 2006 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। वह एविएशन के भी बड़े शौकीन थे और हॉट एयर बैलून से ऊंचाई हासिल करने का विश्व रिकॉर्ड भी उनके नाम रहा।
कभी 37 मंजिला जेके हाउस था ठिकाना
विजयपत सिंघानिया के जीवन की कहानी में जेके हाउस का नाम खास तौर पर सामने आता है। मुंबई के ब्रीच कैंडी इलाके में स्थित यह 37 मंजिला इमारत सिंघानिया परिवार की संपत्ति और विवादों के संदर्भ में लंबे समय तक चर्चा में रही। रिपोर्टों के मुताबिक इमारत के पुनर्विकास के बाद इसमें रहने को लेकर विजयपत सिंघानिया और परिवार के बीच विवाद पैदा हुआ। बाद के वर्षों में यह विवाद पिता और बेटे के बीच सार्वजनिक रूप से सामने आया।

लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब परिवार के भीतर कारोबार और हिस्सेदारी को लेकर मतभेद गहराने लगे।
बेटे को दे दी 37 प्रतिशत हिस्सेदारी
2015 में विजयपत सिंघानिया ने रेमंड में अपनी करीब 37 प्रतिशत हिस्सेदारी बेटे गौतम सिंघानिया को ट्रांसफर कर दी। रिपोर्टों के मुताबिक यह हिस्सेदारी करीब 37.17 प्रतिशत थी और उस समय इसकी कीमत लगभग 1,000 करोड़ रुपये के आसपास बताई गई थी। इसके बाद रेमंड के कारोबार पर गौतम सिंघानिया का नियंत्रण मजबूत हो गया।
एक पिता के लिए यह फैसला सिर्फ कारोबारी फैसला नहीं था। उम्र के उस पड़ाव पर जब इंसान अपने बच्चों को अपना उत्तराधिकारी बनाता है, विजयपत सिंघानिया ने भी अपने कारोबार की बड़ी हिस्सेदारी बेटे को सौंप दी। लेकिन आगे चलकर पिता-पुत्र के रिश्ते में तनाव इतना बढ़ा कि यह मामला सार्वजनिक विवाद और कानूनी लड़ाई तक पहुंच गया।
विजयपत सिंघानिया और गौतम सिंघानिया के बीच विवाद का एक बड़ा मुद्दा जेके हाउस भी बना। कभी जिस आलीशान इमारत में सिंघानिया परिवार रहता था, उसी संपत्ति को लेकर बाद में पिता और बेटे के बीच मतभेद सामने आए।
मीडिया रिपोर्टों में विजयपत सिंघानिया के हवाले से उनके जीवन के अंतिम वर्षों की आर्थिक और पारिवारिक परेशानियों का जिक्र मिलता रहा। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘An Incomplete Life’ में अपने जीवन, कारोबारी फैसलों और परिवार से जुड़े संघर्षों पर भी खुलकर लिखा था।
यही वजह है कि उनकी कहानी सिर्फ एक उद्योगपति के निधन की खबर नहीं रह जाती। यह कहानी उस सवाल को भी सामने लाती है कि जीवनभर मेहनत से बनाई गई संपत्ति और कारोबार को अगली पीढ़ी को सौंपते समय व्यक्ति को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
पिता-पुत्र का विवाद बना सुर्खियों में
विजयपत सिंघानिया और गौतम सिंघानिया के बीच विवाद कई वर्षों तक मीडिया में चर्चा का विषय रहा। हालांकि बाद के समय में दोनों के बीच सुलह की खबरें भी सामने आईं और 2024 में जेके हाउस को लेकर पिता की बेटे से मुलाकात की तस्वीर भी चर्चा में आई थी। इसलिए इस पूरे रिश्ते को केवल एकतरफा कहानी के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
विजयपत सिंघानिया और गौतम सिंघानिया के बीच विवाद कई वर्षों तक मीडिया में चर्चा का विषय रहा। हालांकि बाद के समय में दोनों के बीच सुलह की खबरें भी सामने आईं और 2024 में जेके हाउस को लेकर पिता की बेटे से मुलाकात की तस्वीर भी चर्चा में आई थी। इसलिए इस पूरे रिश्ते को केवल एकतरफा कहानी के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
विजयपत सिंघानिया और गौतम सिंघानिया के बीच विवाद कई वर्षों तक मीडिया में चर्चा का विषय रहा। हालांकि बाद के समय में दोनों के बीच सुलह की खबरें भी सामने आईं और 2024 में जेके हाउस को लेकर पिता की बेटे से मुलाकात की तस्वीर भी चर्चा में आई थी। इसलिए इस पूरे रिश्ते को केवल एकतरफा कहानी के रूप में देखना उचित नहीं होगा। गया था।
28 मार्च 2026 को दुनिया को कहा अलविदा
28 मार्च 2026 की शाम विजयपत सिंघानिया का मुंबई में निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे। रेमंड समूह की ओर से जारी बयान में उनके निधन की पुष्टि की गई और उन्हें दूरदर्शी नेता, परोपकारी तथा प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में याद किया गया। उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया 29 मार्च को मुंबई में हुई।
उनका जीवन कई मायनों में असाधारण रहा। उन्होंने कारोबार में सफलता हासिल की, एविएशन में रिकॉर्ड बनाया, पद्म भूषण प्राप्त किया और रेमंड को एक बड़े भारतीय ब्रांड के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन उनके जीवन का अंतिम अध्याय परिवार और संपत्ति को लेकर पैदा हुए विवादों की वजह से बेहद चर्चित रहा।
विजयपत सिंघानिया की कहानी से क्या सीख?
इस पूरी कहानी से सबसे बड़ी सीख यह निकलती है कि माता-पिता को अपनी संपत्ति और कारोबार अगली पीढ़ी को सौंपते समय भावनाओं के साथ-साथ भविष्य की सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए। बच्चों पर भरोसा करना गलत नहीं है, लेकिन बुढ़ापे की आर्थिक स्वतंत्रता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
अपनी पूरी संपत्ति एक ही बार में किसी के नाम कर देने के बजाय व्यक्ति को अपने जीवनभर के खर्च, स्वास्थ्य, रहने और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर कानूनी और वित्तीय योजना बनानी चाहिए।
विजयपत सिंघानिया की कहानी इसलिए भी याद रखी जाएगी क्योंकि इसमें सफलता की ऊंचाइयों से लेकर पारिवारिक संघर्ष तक जिंदगी के कई रंग दिखाई देते हैं। यह कहानी सिर्फ एक पिता और बेटे के विवाद की कहानी नहीं, बल्कि संपत्ति, उत्तराधिकार, रिश्तों और बुढ़ापे की सुरक्षा को लेकर समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा करती है।
