सरकारी सिस्टम के सामने बड़े-बड़े लोगों की भी कई बार नहीं चलती, लेकिन उत्तर प्रदेश के IAS अधिकारी रिंकू सिंह राही की कहानी इसलिए अलग है, क्योंकि उनके करियर में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने, जानलेवा हमले, मानसिक अस्पताल भेजे जाने, प्रशासनिक कार्रवाई और आखिरकार IAS बनने तक के कई ऐसे मोड़ आए, जिन्होंने उन्हें सुर्खियों में ला दिया।

रिंकू सिंह राही का जन्म 20 मई 1982 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई सरकारी स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और वर्ष 2004 में UPPCS परीक्षा पास कर PCS अधिकारी बने।
बताया जाता है कि अधिकारी बनने के बाद भी रिंकू सिंह राही ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज को दबने नहीं दिया। वर्ष 2009 में उन्होंने उत्तर प्रदेश में छात्रवृत्ति से जुड़े कथित बड़े घोटाले को उजागर करने की कोशिश की। इसी मामले के बाद 26 मार्च 2009 को उन पर जानलेवा हमला हुआ।
नौ गोलियां लगीं, फिर भी हिम्मत नहीं हारी
इस हमले में रिंकू सिंह राही को कई गोलियां लगीं। उनके चेहरे और शरीर के अलग-अलग हिस्सों में गोलियां लगीं, जिनमें एक आंख और जबड़े पर लगी गोली भी शामिल थी। इस हमले के बाद उनकी एक आंख की रोशनी चली गई और सुनने तथा खाने-पीने में भी परेशानियां होने लगीं।
हमले के बाद उन्हें लंबे समय तक इलाज और आराम की जरूरत पड़ी। करीब तीन महीने तक वह अस्पताल में रहे। लेकिन इस घटना ने उनके हौसले को तोड़ने के बजाय भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई को और मजबूत कर दिया।
रिंकू सिंह राही ने इसके बाद भी सरकारी व्यवस्था में कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना जारी रखा।
भ्रष्टाचार के खिलाफ धरना और मानसिक अस्पताल भेजे जाने का दावा
मार्च 2012 में रिंकू सिंह राही भ्रष्टाचार के विरोध में धरने पर बैठ गए। उनके अनुसार, उस समय उनके विरोध को लेकर विभाग के कुछ अधिकारियों ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल उठाए।
कहा जाता है कि 25 मार्च 2012 की रात उन्हें लखनऊ के मानसिक अस्पताल ले जाया गया। आरोप था कि उनका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है।
हालांकि, रिंकू सिंह राही के मुताबिक अस्पताल में उनकी जांच हुई और उन्हें मानसिक रूप से स्वस्थ पाया गया। यह घटना भी उनके जीवन की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो गई।
जहां एक तरफ उनके विरोधियों ने उन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ बताने की कोशिश की, वहीं रिंकू सिंह राही ने इसके बाद अपने लिए एक नया लक्ष्य तय किया—IAS अधिकारी बनकर जनता की सेवा करना।
16 प्रयासों के बाद बने IAS
रिंकू सिंह राही ने UPSC की तैयारी शुरू की। उनका रास्ता आसान नहीं था। उन्होंने लगातार प्रयास किए और कथित तौर पर 16 प्रयासों के बाद वर्ष 2021 में UPSC परीक्षा पास की।
इसके बाद वह भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी IAS का हिस्सा बने।
एक ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने पहले जानलेवा हमले का सामना किया, शारीरिक परेशानियों से जूझा और अपने करियर में कई विवादों का सामना किया, UPSC पास करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।
2025 में शाहजहांपुर में SDM की जिम्मेदारी
वर्ष 2025 में रिंकू सिंह राही की पोस्टिंग उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले की पुवायां तहसील में SDM के तौर पर हुई।
यहां भी उनका काम करने का तरीका चर्चा में आ गया।
बताया जाता है कि तहसील परिसर में साफ-सफाई की स्थिति खराब थी। आरोप था कि कुछ मुंशी और अन्य लोग खुले में शौच करते थे। रिंकू सिंह राही ने खुले में शौच के खिलाफ सख्ती दिखाने की कोशिश की।
इसी दौरान एक मुंशी के खुले में शौच करने पर उन्होंने उसे कथित तौर पर उठक-बैठक करने को कहा।
मुंशी ने उठक-बैठक की, लेकिन बाद में यह मामला तहसील के वकीलों तक पहुंच गया। वकीलों ने इसका विरोध किया और सवाल उठाया कि किसी अधिकारी को इस तरह सजा देने का अधिकार कैसे हो सकता है।
इसके बाद कई वकील विरोध में धरने पर बैठ गए।
वकीलों के सामने खुद की उठक-बैठक
मामला बढ़ने के बाद रिंकू सिंह राही ने कथित तौर पर कहा कि अगर उनकी उठक-बैठक कराने पर सवाल उठाया जा रहा है तो वह खुद भी उठक-बैठक कर सकते हैं।
इसके बाद उन्होंने वकीलों के सामने कान पकड़कर उठक-बैठक की।
इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो सामने आने के बाद कुछ लोगों ने रिंकू सिंह राही की आलोचना की। आलोचकों का कहना था कि एक IAS अधिकारी को अपनी गरिमा बनाए रखनी चाहिए और किसी विवाद का समाधान इस तरह नहीं किया जाना चाहिए।
विवाद बढ़ने के बाद उन्हें फील्ड पोस्टिंग से हटाकर बोर्ड ऑफ रेवेन्यू में स्थानांतरित कर दिया गया।
काम नहीं मिला तो वेतन भी लौटा दिया
ट्रांसफर के बाद रिंकू सिंह राही ने दावा किया कि उन्हें वेतन तो मिल रहा था, लेकिन उनसे अपेक्षित काम नहीं लिया जा रहा था।
उनका तर्क था कि यदि वह सरकार के लिए कोई काम नहीं कर रहे हैं तो उस वेतन को रखना उनके लिए उचित नहीं है।
इसी सोच के चलते उन्होंने कथित तौर पर करीब दो महीने का वेतन सरकार को वापस कर दिया।
इसके बाद 31 मार्च 2026 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की।
ईमानदारी या व्यवस्था से टकराने की कीमत?
रिंकू सिंह राही की पूरी कहानी कई सवाल खड़े करती है।
क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले अधिकारी को व्यवस्था के भीतर रहकर ही लड़ाई लड़नी चाहिए? क्या सख्ती और अनुशासन के नाम पर अधिकारी को अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए? और क्या एक अधिकारी का सिस्टम से लगातार टकराव उसके करियर को प्रभावित करता है?
रिंकू सिंह राही के समर्थक उन्हें एक ऐसे अधिकारी के रूप में देखते हैं जिसने मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वहीं उनके आलोचक उनके काम करने के तरीके और कुछ प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाते रहे हैं।
लेकिन उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि एक व्यक्ति कितनी भी मुश्किल परिस्थितियों से गुजरे, अगर वह अपने लक्ष्य पर कायम रहे तो वह अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है।
नौ गोलियों के हमले से लेकर IAS बनने तक का सफर निश्चित तौर पर आसान नहीं रहा। अब रिंकू सिंह राही का इस्तीफा भी चर्चा में है।
