लताबाई की कहानी: चार बेटों को पढ़ाया-लिखाया, बुढ़ापे में वृद्धा आश्रम पहुंचीं
मध्य प्रदेश के इंदौर से सामने आई लताबाई की कहानी मां-बेटे के रिश्ते और बुढ़ापे की जिंदगी को लेकर कई सवाल खड़े करती है। बताया जा रहा है कि लताबाई के चार बेटे थे। पति के निधन के बाद उन्होंने मेहनत-मजदूरी करके अपने चारों बेटों की परवरिश की और उन्हें पढ़ाया-लिखाया। उम्र बढ़ने के साथ उन्हें उम्मीद थी कि जिन बच्चों के लिए उन्होंने पूरी जिंदगी संघर्ष किया, वही बच्चे उनके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे। लेकिन जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर उन्हें वृद्धा आश्रम में रहना पड़ा।
बताया गया कि लताबाई ने अपने जीवनभर की कमाई में से पैसे बचाकर इंदौर के सिलिकॉन क्षेत्र में एक फ्लैट खरीदा था। उनका उद्देश्य था कि बुढ़ापे में उनके पास रहने के लिए अपना घर हो और परिवार के लोग भी उसमें साथ रह सकें।
समय बीता और चारों बेटों की शादियां हो गईं। बेटों ने अपना-अपना जीवन शुरू कर लिया। आरोप है कि इसके बाद लताबाई के लिए परिस्थितियां बदलती चली गईं और उन्हें अपने ही घर में परेशानी का सामना करना पड़ा।

फ्लैट से बाहर आने के बाद सड़क पर गुजरी जिंदगी
कहानी के अनुसार, लताबाई जिस फ्लैट में रहती थीं, वह उनके नाम पर था। इसके बावजूद बाद में कथित तौर पर फ्लैट उनके बेटों के नाम करवा लिया गया और उन्हें वहां से बाहर कर दिया गया।
घर से निकलने के बाद लताबाई के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजमर्रा के जीवन को चलाने की थी। बताया जाता है कि वह सड़क किनारे बैठकर राहगीरों से मदद मांगती थीं। इसी दौरान जानकी वृद्धा आश्रम के सदस्यों की नजर उन पर पड़ी।
आश्रम के सदस्य उन्हें अपने साथ लेकर गए और वहां रहने की व्यवस्था की। इसके बाद करीब आठ महीने तक लताबाई उसी वृद्धा आश्रम में रहीं।
वृद्धा आश्रम में रहने के दौरान भी लताबाई के मन में अपने बेटों के प्रति नाराजगी से ज्यादा एक मां की उम्मीद बनी रही। बताया गया कि वह अक्सर अपनी एक इच्छा जाहिर करती थीं कि जब उनकी मृत्यु हो तो उनके बेटे ही उनका अंतिम संस्कार करें।
13 सितंबर को हुई लताबाई की मौत
बताया गया कि कुछ समय से तबीयत खराब रहने के बाद 13 सितंबर 2026 को लताबाई का निधन हो गया। इसके बाद वृद्धा आश्रम के सामने एक मुश्किल सवाल था कि उनकी अंतिम इच्छा कैसे पूरी की जाए।
आश्रम प्रबंधन ने कथित तौर पर उनके चारों बेटों से संपर्क करने का प्रयास किया। उम्मीद थी कि मां की मृत्यु की खबर सुनकर बेटे आएंगे और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाएंगे।
लेकिन परिजनों की ओर से मिले कथित जवाबों ने आश्रम प्रबंधन को भी परेशान कर दिया।
बड़े बेटे ने कहा- नवंबर तक डीप फ्रीजर में रख दो
कहानी के मुताबिक, जब सबसे बड़े बेटे को फोन कर मां के निधन की जानकारी दी गई तो उसने बताया कि उसके बेटे की शादी नवंबर में है। कथित तौर पर उसने कहा कि अगर शव को डीप फ्रीजर में सुरक्षित रखा जा सकता है तो नवंबर तक रखा जाए और शादी के बाद परिवार आकर अंतिम संस्कार कर देगा।
इसके बाद आश्रम प्रबंधन ने दूसरे बेटे से संपर्क किया। बताया गया कि दूसरे बेटे ने अंतिम संस्कार में खुद शामिल होने के बजाय QR कोड भेजने की बात कही और कहा कि वह कुछ पैसे भेज देगा, बाकी आश्रम प्रबंधन अपने हिसाब से अंतिम संस्कार कर दे।
छोटे बेटे ने कहा- ऐसी खबर देकर परेशान मत कीजिए
कहानी के अनुसार, परिवार के सबसे छोटे बेटे से संपर्क करने पर भी आश्रम को अपेक्षित जवाब नहीं मिला। कथित तौर पर उसने कहा कि घर में शादी का माहौल है और परिवार शादी की तैयारियों में व्यस्त है। उसने ऐसी दुखद खबर देकर परेशान नहीं करने की बात कही।
यह घटनाक्रम अगर बताए गए विवरण के अनुसार सही है, तो यह बुजुर्गों की स्थिति और बदलते पारिवारिक रिश्तों को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
तीन दिन इंतजार के बाद आश्रम ने किया अंतिम संस्कार
बताया गया कि आश्रम प्रबंधन ने बेटों के आने का करीब तीन दिन तक इंतजार किया। जब कोई बेटा अंतिम संस्कार के लिए नहीं पहुंचा, तो आखिरकार आश्रम प्रबंधन ने ही लताबाई के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई।
इस तरह जिस मां की आखिरी इच्छा थी कि उसके बेटे ही उसे अंतिम विदाई दें, उसकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।
लताबाई की कहानी केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बुजुर्गों की सुरक्षा और उनके भविष्य को लेकर भी सवाल उठाती है। पूरी जिंदगी बच्चों के भविष्य के लिए मेहनत करने वाले माता-पिता अक्सर अपनी जरूरतों और आर्थिक सुरक्षा को पीछे छोड़ देते हैं। लेकिन बुढ़ापे में परिस्थितियां कैसी होंगी, यह हमेशा निश्चित नहीं होता।
