एक ताबूत, पांच शहर, दो देश और रास्ते में गिरते हुए। इतिहास में जनाज़े बहुत हुए हैं लेकिन ऐसा जनाजा शायद पहली बार हुआ है। क्योंकि जिस रात ये ताबूत ईरान की सरहद को पार करके इराक के शहर नज़फ पहुंचा। ठीक उसी रात अमेरिका ने ईरान के 80 से ज्यादा ठिकानों पर हमला कर दिया। एक तरफ लाखों लोग मातम में सीना पीट रहे थे। दूसरी तरफ उन्हीं के देश के बंदरगाहों पर धमाके गूंज रहे थे। जैसे जनाजे के चिरागों की रोशनी में बबू की आग भी जल रही थी। यह ताबूत जो लाल कपड़े में लिपटा है जिसे आप देख रहे हैं। यह ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामनेई का है। वही खामई जिन्होंने 37 सालों तक ईरान पर राज किया। जो अमेरिका को शैतान कहा करते थे और जिनकी मौत अमेरिका के ही बम से हुई। लेकिन हैरानी की बात यह है कि मौत को 4 महीने बीत गए लेकिन आज तक खामने दफन नहीं हुए। अब इस ताबूत पर लोगों ने लाल कपड़ा चढ़ाया है और शिया परंपरा को समझने वाले जानते हैं कि लाल रंग का सिर्फ एक मतलब होता है। वो होता है खून का बदला खून से। कपड़ा चढ़ने के 24 घंटे के अंदर समंदर में तीन जहाज जल उड़ जाते हैं। कुवैत, बहरीन पर मिसाइलें गिर जाती हैं। डॉनल्ड ट्रंप नाटो समिट में खड़े होकर ऐलान करते हैं कि ईरान से सीज फायर खत्म हो चुका है। टू मी आई थिंक इट्स। यानी एक रात, दो घटनाएं। एक तरफ ताबूत का इराक में उतरना और दूसरी तरफ सीज फायर का उसी वक्त दम तोड़ देना। दुनिया इन्हें दो अलग-अलग खबरें समझ रही है।

लेकिन सच यह है कि यह एक कहानी के दो सिरे हैं। और इसीलिए आज इस कहानी में दो बड़े सवाल। पहला खामई का ताबूत आखिर इराक क्यों ले जाया गया? क्योंकि इराक वो देश है जिससे ईरान ने कभी आठ साल की खूनी जंग लड़ी थी। शिया देश होने के बावजूद दो मुल्कों में कभी पटती नहीं थी। ऐसे में दुश्मन मुल्क में खामने का जनाजा क्यों पहुंचा? और दूसरा जब ईरान से खामने का जनाजा इराक पहुंचा तो उसी वक्त अमेरिका ने सीज फायर खत्म क्यों कर दिया? क्या यह महज इत्तेफाक है या यह कोई संदेश है? क्या मायने हैं इसके? यकीन मानिए जवाब जितना धर्म में छिपा है उतना ही सियासत में और इसीलिए आज इस कहानी को समझना बहुत जरूरी है। नमस्कार दोस्तों, मैं हूं शुभांकर मिश्रा और आज की कहानी देखने में तो एक जनाजे की खबर लगती है लेकिन इसकी परतों में धर्म, राजनीति, तेल और एक नई जंग सब कुछ छिपा है। ओपनिंग में हमने आपसे दो सवाल पूछे थे कि ताबूत, इराक क्यों और सीज फायर खत्म क्यों? इन दो सवालों तक पहुंचने के लिए हमें कुछ परतें खोलनी पड़ेगी। हमें समझना पड़ेगा कि आखिर खामने का जनाजा चार महीने से क्यों रुका है? क्यों चार महीने बाद वो दफन हो रहे हैं?
हमें समझना पड़ेगा कि इराक का शहर नजफ जहां खामने का जनाजा पहुंचा है। उससे उनका 69 साल पुराना क्या रिश्ता है? इस्लाम में नजफ शहर के मायने क्या है? क्या अहमियत है? इसके अलावा हम समझेंगे कि ईरान का नया सुप्रीम लीडर अपने पिता के जनाजे से क्यों गायब है? कहां है खामई के बेटे? और आखिर में वो बात जो ईरान की सरकार छिपा रही है। इसलिए हर परत आज बहुत गहरी है। अगले 10-12 मिनट हमें आपके चाहिए अगर इस कहानी को आप समझना चाहते हैं विस्तार से। हालांकि इस कहानी को हम समझाएं उससे पहले हमारी आपसे गुजारिश है कि थोड़ा रिश्ता हमसे भी मजबूत कीजिए। हमारे WhatsApp चैनल से आप जुड़िए ताकि यह वीडियोस आपको खोजने ना पड़े। इंतजार ना करना पड़े। हम आप तक सीधे पहुंचा दिया करें और उसके लिए आपको ज्यादा कुछ नहीं करना है। कमेंट सेक्शन में जाकर जो पहला कमेंट है उसकी लिंक पर क्लिक कर दीजिए या स्कैन है WhatsApp से कैमरा खोल के स्कैन करके जुड़ जाइए या फिर सीधे WhatsApp पर जाकर शुभांकर मिश्रा सर्च कर दीजिए और आपको मेरा WhatsApp चैनल मिल जाएगा। आपको सारे वीडियोस मिल जाया करेंगे। अब शुरुआत करते हैं पहले सवाल से कि खामोई का जनाजा आखिर 4 महीने तक क्यों रुका रहा? तो देखिए तारीख थी 28 फरवरी 2026। आप सब जानते होंगे।
अमेरिका और इजराइल की ईरान से जंग का पहला दिन था। तेहरान में खामई के दफ्तर पर हवाई हमला होता है और उसमें खामई अपने परिवार के चार लोगों समेत मारे जाते हैं। यही वो जख्म है जो ईरान के करोड़ों समर्थकों के दिल में आज भी कांटे की तरह छुबा हुआ है। मौत के बाद उनके बेटे मुस्तफा खामई को नया सुप्रीम लीडर घोषित किया गया लेकिन जंग जारी थी। बमबारी के बीच इतने बड़े नेता का जनाजा निकालना मुमकिन नहीं था। जनाजा पहले मार्च में होना था। फिर टल गया। अब आप पूछेंगे कि 4 महीने तक शव कैसे रखा गया? तो देखिए ईरान की जनाजा कमेटी के प्रवक्ता ने खुद बताया कि खामनी और उनके परिवार के शव धार्मिक और कानूनी नियमों के मुताबिक पूरी हिफाजत में रखे गए। वो ना दफनाए गए ना कहीं भेजे गए। फिर तीन हफ्ते पहले ट्रंप और ईरान के बीच में सीज फायर होता है। जिसमें यह तय हुआ था कि समंदर के रास्ते खुलेंगे और 60 दिन में एक बड़ी डील पर बात होगी। जंग रुकते ही ईरान ने वह काम शुरू किया जो 4 महीने से अधूरा था। लेकिन ईरान ने इसे आम जनाजा नहीं रहने दिया। छ दिन का कार्यक्रम बना 4 से लेकर 9 जुलाई तक और इसका रास्ता तेहरान से कोम, इराक के नजफ और कर्बला से होते हुए मशहद में दफन होने पर खत्म होगा। सरकार ने इस बीच में 5 करोड़ रोटियों का इंतजाम किया। 5 करोड़ यानी पूरी दिल्ली को अगर आप दो-दो रोटी बांट दें तब भी रोटियां बच जाएंगी। तेहरान की 5000 मस्जिदें, 700 स्कूल बाहर से आए लोगों के लिए खुले छोड़ दिए गए हैं।
शहर में मुफ्त इंटरनेट पॉइंट लगाए गए हैं और दुकानों को 24 घंटे खुले रहने का हुक्म दिया गया है। यह लक्ष्य रखा गया है कि भीड़ साल 1989 में खुनी के जनाजे से भी ज्यादा बड़ी हो। अब खुमैनी के जनाजे का पैमाना भी समझ लीजिए। वो जनाजा इतना बड़ा था कि भगदड़ में 10 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी और 10,000 से ज्यादा लोग उस दौर में घायल हुए थे। ईरान इस बार उससे भी बड़ी भीड़ चाहता है। यूरोपीय मीडिया ने तो साफ-साफ शब्दों में लिखा है कि ईरान इतिहास का सबसे बड़ा स्टेट फेडरल करने की तैयारी में है। यानी 4 महीने का इंतजार मजबूरी में शुरू हुआ था। लेकिन बाद में ईरान ने उसे मौके में तब्दील कर दिया। अब सवाल है कि किस मौके में? और इसी का जवाब जो है वो नज़फ में छिपा है कि खामई का सबूत सरहद पार नज़फ क्यों ले जाया गया। नजफ दरअसल इराक का शहर है। लेकिन दुनिया के करीब 20 करोड़ शिया मुसलमानों के लिए यह धरती की सबसे पवित्र जगहों में से एक है। क्योंकि यहां पर इमाम अली दफन है। इमाम अली यानी पैगंबर मोहम्मद के दामाद जिन्हें शिया मुसलमान पैगंबर का सच्चा वारिस मानते हैं। पूरा शिया इस्लाम इसी मान्यता से जन्मा है। और पूरा नजफ शहर इमाम अली की दरगाह के चारों तरफ बसा है। जैसे ईसाइयों के लिए वेटिकन और हिंदुओं के लिए काशी वैसे ही शियाओं के लिए नजफ शहर है। अब नज़फ सिर्फ दरगाह नहीं है। शिया दुनिया की सबसे बड़ी पाठशाला भी है। जहां सदियों से बड़े धर्मुगुरु पढ़ते और पढ़ाते आए हैं। इराक के सबसे बड़े धर्मुगुरु अयातुल्लाह सिस्तानी आज भी यहीं रहते हैं। और ईरान की क्रांति के जनक खुमेनी ने भी अपनी जिंदगी के कई साल यहीं गुजारे थे।
और इसी शहर से खामने की भी एक अधूरी कहानी जुड़ी है। साल 1957 में 18 साल का एक मदरसा छात्र पढ़ने के लिए नजफ पहुंचा था। उसने वहां पर उस दौर के मशहूर आलिम अयातुल्लाह मोहसिन अल हकीम जैसे उस्तादों से तालीम ली और सपना देखा कि वो नजफ में रहकर एक बड़ा आलिम बनेगा। लेकिन उसके पिता ने उसे वापस बुलाकर ईरान के शहर कोम भेज दिया। वही छात्र आगे चलकर ईरान का सुप्रीम लीडर बना और अब पूरे 69 सालों बाद नजफ लौटा है। मगर ताबूत में। जिस शहर में वह जिंदगी बिताना चाह रहा था, उसी शहर की गलियों से उसकी आखिरी विदाई हो रही है। अयातुल्लाह खामनी की हम बात कर रहे हैं। लेकिन इस भावुकता के पीछे केवल इमोशनल एंगल नहीं है। सियासी एंगल भी है। सियासी परत छिपी है और यही वो परत है जो इस पूरे जनाजे को श्रद्धांजलि से बदलकर एक चाल बना देती है। अब आपके मन में सवाल आना चाहिए कि खामोई के जनाजे के पीछे असली चाल क्या? क्यों उसे इराक ले जाया गया? तो देखिए यह वो बात है जो शायद ही कोई बता रहा हो। शिया दुनिया में सदियों से दो बड़े केंद्र आपस में आमने-सामने रहे। इराक का नजफ और ईरान का को और दोनों की सोच में जमीन आसमान का फर्क है। नजफ के धर्म गुरुओं की परंपरा रही है कि धर्म को सत्ता से दूर रहना चाहिए। आलिम का काम पढ़ाना और राह का दिखाना है। हुकूमत चलाना नहीं। जबकि ईरान का ढांचा इसके बिल्कुल उलट है। जहां सबसे बड़ा धर्मुरु ही देश का सबसे बड़ा शासक होता है। खुद अयातुल्लाह सिस्तानी ने कभी ईरान वाले मॉडल को भी नहीं अपनाया था। अब आप सोचिए ईरान अपने सुप्रीम लीडर का ताबूत उसी नजफ की गलियों से घुमा रहा है जिसकी परंपरा उसके अपने मॉडल के खिलाफ है। यह सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं है।
यह नजफ की विरासत पर दावा है। ईरान दुनिया के शियाओं को दिखाना चाहता है कि हमारा लीडर इमाम अली की सीधी विरासत का हकदार था और हमारी हुकूमत ही शिया दुनिया की असली रहनुमा है। अब यहां पर आपको एक सेकंड रुकना पड़ेगा क्योंकि यही इतिहास का सबसे अजीब मोड़ है। यही इराक है जिससे ईरान ने 80 के दशक में पूरे 8 सालों तक खूनी जंग लड़ी थी। 8 साल सद्दाम हुसैन का वो दौर था। जिसमें दोनों तरफ के लाखों लोग मारे गए थे और खुद खामने उस जंग के दौरान ईरान के राष्ट्रपति थे। आज वही इराक उनके ताबूत के लिए पूरे देश में छुट्टी घोषित कर रहा है और उसके बड़े नेता लोगों से जनाजे में शामिल होने की अपील कर रहे हैं। यानी जिस देश से जिंदगी भर जंग लड़ी गई उसी देश ने आखिरी सफर में कंधा दिया। कमाल की बात है ना वक्त की वक्त कैसे बदल जाता है? सियासत कैसे दुश्मनी को भी इस्तेमाल में बदल देती है। और यही उसकी सबसे बड़ी मिसाल है। दूसरी चाल जो है वो है शहादत काफे। नजफ के बाद ताबूत जो है वो कर्बला जाएगा। जहां पर इमाम हुसैन की दरगाह है जिन्हें 1400 साल पहले 72 साथियों समेत शहीद किया गया था। कर्बला शिया दुनिया में शहादत का सबसे बड़ा प्रतीक है। और खामई के ताबूत को वहां से ले जाकर ईरान उन्हें सीधे इमाम हुसैन की कतार में खड़ा कर रहा है। इसलिए ताबूत पर लाल कपड़ा है। क्योंकि शिया परंपरा में लाल झंडा तब तक नहीं उतरता जब तक शहीद के खून का हिसाब ना ले लिया जाए। सरकारी बयानों में भीड़ के अंदर दो ही नारे गिनाए जा रहे हैं। दुश्मन से लड़ाई और लीडर के खून का बदला। और ईरान का बदला कैसा होता है इसकी एक मिसाल इतिहास से मौजूद है।
साल 2020 में जब अमेरिका ने ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी को मारा था तो ईरान ने फौरन बड़ा हमला नहीं किया बल्कि लंबा खेल खेला। कहा कि असली बदला अमेरिका को इस पूरे इलाके से निकालना है। यानी लाल कपड़ा किसी एक हमले का नहीं एक लंबी रणनीति का ऐलान हो सकता है। और उस रणनीति की पहली झलक जनाजे के 24 घंटे के अंदर दिखाई पड़ी। खामने का जनाजा इराक पहुंचा और जंग शुरू हो गई और अब इस जंग का असर हम पर आप पर भी पड़ेगा। आप इस टाइमलाइन को समझिएगा। सोमवार और मंगलवार को ईरान ने हॉर्मुश के समंदर में तीन मालवाहक जहाजों पर हमला किया। एक जहाज क़तर का था। एक सऊदी अरब का और साथ में चेतावनी दी कि हमारे बताए रास्ते से नहीं चलोगे तो सुरक्षा की गारंटी नहीं है। और मुझ समंदर का वह तंग रास्ता जिससे दुनिया का हर पांचवा तेल का जहाज गुजरता है। भारत के लिए भी यह जीवन रेखा है क्योंकि हमारे आयात होने वाले कच्चे तेल का सबसे बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से हिंदुस्तान आता है। वहां हमला की खबर आते ही तेल की कीमतों में आग लग गई और अगर यह रास्ता फिर से लंबा बंद हुआ तो यकीन मानिए हिंदुस्तान में एक बार फिर पेट्रोल, डीजल, माल ढुलाई, महंगाई इन सबका बिल आपकी जेब से भी जाएगा। फिर मंगलवार की रात आती है। ताबूत जो है वह नजफ के हवाई अड्डे पर उतर रहा था। ईरान के राष्ट्रपति, विदेश मंत्री खुद मौजूद थे। इराक के बड़े अधिकारी इस्तकबाल में खड़े थे और ठीक उसी वक्त अमेरिका ने 80 से ज्यादा ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए। निशाने पर था खार्क द्वीप जो ईरान के तेल निर्यात का सबसे बड़ा केंद्र है और बंदर अब्बास जैसे बंदरगाह अमेरिकी अधिकारी खुद मान रहे हैं कि जवाब जानबूझकर हैसियत से बढ़ा दिया गया। साथ ही अमेरिका ने ईरान से तेल बेचने की वो छूट भी छीन ली जो सीज फायर की अहम शर्त थी। वो द्वार तड़के ईरान ने पलटवार में कुवैत और बहरीन पर मिसाइलें और ड्रोन दाग दी क्योंकि वहां पर अमेरिका के सैनिक तैनात है। बहरीन मिसायरन बजे और लोगों से घरों में छिपने को कहा गया। यानी यह जंग अब सिर्फ सिर्फ दो देशों की नहीं है।

यह वापस से कतर से लेकर सऊदी, कुवैत और बहरीन तक पूरा खाड़ी इलाका इसकी चपेट में आ रहा है। लेकिन भारत के लिए चिंता की वजह एक और है। इन्हीं खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय काम करते हैं जो हर साल अरबों डॉलर घर बेचते हैं। जिन शहरों में आज सायरन बज रहे हैं। वहां की गलियों में लाखों भारतीय परिवार रहते हैं। और भारत इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से ले रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि खामई के जनाजे में भारत सरकार ने अपना आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजा था। जिसमें बिहार के राज्यपाल और पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन के साथ विदेश राज्य मंत्री भी शामिल थे। इसके बाद बुधवार का दिन आता है। टर्की के अंकारा में नाटो समिट का मंच। वहां ट्रंप ने कह दिया कि मेरे लिए यह सीज फायर खत्म है। ना कोई डील ना कोई बातचीत सब वक्त की बर्बादी। यानी डोनाल्ड ट्रंप ने जो समझौता ठीक तीन हफ्ते पहले खुद साइन किया था जो उनकी जुबान से आया था वो उनकी जुबान से ही दफन हो गया। ईरान ने पलट कर सारा दोष अमेरिका पर डाला कि समझौता तोड़ने वाला वो है जिसने पहले हमले किए और बाद में तेल पर पाबंदी लगाई। अब आप इस पूरी टाइमिंग पर गौर कीजिए। जिस हफ्ते ट्रंप नाटो के मंच पर दुनिया के नेताओं के बीच बैठे थे, उसी हफ्ते ईरान ने समंदर में जहाज जलाए। जानकारों का मानना है कि ईरान ट्रंप को उन्हीं के मंच पर नीचा दिखाना चाहता था। यह कहकर कि तुम अपने समिट में तेल के रास्ते की सुरक्षा पर भाषण दो और हम वह रास्ता बंद करके दिखा देंगे। जनाजा हमले और नाटो समिट तीनों का एक ही हफ्ते में होना इत्तेफाक नहीं है यह सोची समझी में साथ लगता है। अब वापस आते हैं उस सवाल पर जो हमने आपसे शुरू में पूछा था। कि ताबूत इराक पहुंचते ही सीज फायर क्यों खत्म हुआ?
जवाब क्योंकि यह जनाजा ईरान की ताकत का खुला ऐलान था। ईरान मानो अमेरिका को बता रहा था कि हम झुके नहीं हैं और हमारा असर सरहद पार तक है। हॉर्मोश के हमले उसी ऐलान पर अमल थे। अमेरिका ने उस अमल का जवाब 80 ठिकानों पर बमों से दिया और तीन हफ्ते पुराने सीज फायर को इसी टकराव में खत्म कर दिया गया। वो दम तोड़ गया। यानी ताबूत का इराक जाना और सीज फायर खत्म होना दो अलग खबरें नहीं जैसा हमने कहा था। एक ही सिक्के के दो पहलू है। हालांकि खामनई के जनाजे में एक सवाल जो दुनिया के सभी लोगों के मन में आया वो यह था कि खामई के जनाजे से ईरान के नए सुप्रीम लीडर कहां गायब है? खामई की मौत के बाद आपको याद होगा उनके बेटे मुस्तबा खामने को गद्दी मिली थी। वही मुस्तबा मार्च से लेकर आज तक एक बार भी लोगों के सामने नहीं आए। अपने पिता के जनाजे तक में वो दिखाई नहीं पड़े। जबकि बाकी तीनों भाई वहां मौजूद थे। यह बताया जा रहा है कि इसकी वजह उनकी हत्या का खतरा है और यह डर बेवजह नहीं है क्योंकि मार्च में ही ईरान के सुरक्षा प्रमुख की हत्या हुई। इजराइल के रक्षा मंत्री खुलेआम कह रहे हैं कि मुस्तबा मौत के निशाने पर है। लेकिन कहानी सिर्फ सुरक्षा की नहीं है। जिस हमले में आया खामई मारे गए थे। उसी आग और मलबे के बीच कहा जाता है कि मुस्तबा भी घायल हुए थे। और उस हमले में उनकी पत्नी और बेटे की भी जान गई थी। यानी जिस दिन उन्हें दुनिया की सबसे खतरनाक कुर्सियों में से एक कुर्सी मिली उसी दिन उनका लगभग पूरा परिवार उजड़ गया था और यही कहानी में एक पेच है। दो कहानियां आमने-सामने आकर खड़ी होती हैं। ईरान की सरकार कहती है कि मुस्तबा को लगी चोट मामूली थी। बस दो-तीन टांके लगे और उसी रात वो अस्पताल से घर गए। लेकिन बड़े अंतरराष्ट्रीय अखबारों की रिपोर्ट्स जो खुद ईरानी अधिकारियों के हवाले से छपी है वो कुछ अलग कहानी बयां करती है। उसके मुताबिक मुस्तफा के पैर की तीन सर्जरी हो गई है और वो नकली पैर के इंतजार में है।
उनके चेहरे पर गहरे जख्म है और जलने की वजह से बोलने में तकलीफ है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि वह अपने पिता के जनाजे में आना चाहते थे। लेकिन सुरक्षा अधिकारियों ने साफ-साफ मना कर दिया। सच इन दोनों कहानियों के बीच में कहीं है या है भी यह कोई नहीं जानता क्योंकि 4 महीने में मुस्तबा की एक तस्वीर एक वीडियो एक आवाज भी सामने नहीं आई। उनके सारे बयान लिखे हुए कागज के होते हैं जिन्हें सरकारी टीवी के एंकर पढ़ते हैं। और सबसे हैरान करने वाली डिटेल रिपोर्ट के मुताबिक मुस्तफा तक संदेश हाथ से लिखी चिट्ठियों में बंद लिफाफों में कूरियर की एक चेन के जरिए गाड़ियों और मोटरसाइकिलों तक पहुंचाए जाते हैं ताकि कोई सिग्नल पकड़ कर उनका ठिकाना ना खोज पाए। बड़े फौजी कमांडर तक उनसे मिलने नहीं जाते। इस डर से कि पीछा करके इजराइल उन तक पहुंच जाएगा। सवाल फिर देश चला कौन रहा है? ईरान किसके हाथ में है? रिपोर्ट्स कहती है कि जंग, सुरक्षा और कूटनीति के असली फैसले इन दिनों फौज के बड़े जनरलों को ले रहा है और मुस्तबा एक तरह से मोहर लगाने वाले चेयरमैन बनकर अभी हैं। अगर यह सच है तो अमेरिका से जंग के मुहाने पर खड़े देश की कमान असल में उनके जनरलों के हाथ में है जिनके लीडर का ताबूत अभी नजफ की गलियों में घूम रहा है। अब आखिर के इस पूरे सेक्शन में एक लाइन याद रखिए।
दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो जंग भी लड़ रहा हो और जिसका सबसे बड़ा नेता 4 महीने से किसी ने देखा ना हो। सवाल क्या खामई के जनाजे में भी कुछ छिपाया जा रहा है? यह इस कहानी की वो आखिरी परत है जो आपको हैरान करेगी क्योंकि जो कोई खामई के जनाजे की यह बड़ी भीड़ देख रहा है वो यह सवाल कर रहा है। ईरान के बाहर बैठे विपक्षी मीडिया का दावा है कि तेहरान में नगर निगम के कर्मचारियों को आदेश भेजकर जनाजे में भेजा गया। यह भीड़ पूरी तरह अपने आप नहीं उमड़ी। कुछ रिपोर्ट्स यहां तक कहती हैं कि इतने महीने बाद ताबूत में असल है क्या? हालांकि यह दावे हम आपको बता दें सारे विरोधी खेमे के हैं। इनकी पुष्टि नहीं होती है। इसलिए आखिरी सच मत मानिए। लेकिन इतना जरूर बताते हैं कि जनाजा जितना धार्मिक है उससे कहीं ज्यादा राजनीतिक भी। एक जानकार ने इसे एक लाइन में यूं कहा कि धार्मिक कपड़ों में लिपटा हुआ यह राजनीतिक इवेंट है जिसका मकसद घर में हुकूमत की पकड़ दिखाना और बाहर दुश्मन को डराना है और शायद सच भी इन्हीं दोनों के बीच में है। करोड़ों लोगों का दुख असली है। यह हम भी मानते हैं। लेकिन उस दुख को जिस तरह सजाकर, घुमाकर और दुनिया को दिखाकर इस्तेमाल किया जा रहा वो एक कैलकुलेटेड हिसाब किताब है। और इसीलिए सवाल कि खामईक के दफन होने के बाद आगे क्या होगा? खामने का ताबूत 9 जुलाई को उनके जन्म स्थान मशहद पहुंचेगा और वहां पर उन्हें दफना दिया जाएगा।
दुनिया की नजर इस बात पर है कि दफन के दिन ईरान बदले का कोई बड़ा ऐलान करता है या फिर नहीं। क्या दफन होने के दिन मुस्तबा खामनी पहली बार दुनिया के सामने आएंगे? दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही सूरतें भारी है। अगर मुस्तबा सामने आए तो 4 महीने की सारी अटकलों से पर्दा गिर जाएगा और ईरान की कमान का चेहरा दुनिया देख लेगी। अगर नहीं आए तो लगभग मोहर लग जाएगी कि ईरान की असली ताकत जनरलों के हाथ में है। उधर हारमूज में हर जलता जहाज तेल के बाजार को बेचैन कर रहा है और यह बेचैनी भारत के पेट्रोल पंप तक भी पहुंच रही है। एक ताबूत की यात्रा ने दो देशों की जंग को दोबारा जिंदा किया है। और अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आगे क्या होगा? सवाल यह भी है कि जो हुकूमत अपने लीडर की मौत को इतनी बारीकी से इस्तेमाल कर सकती है। सोच कर देखिए वो उसके बदले को कैसे इस्तेमाल करेगी। क्योंकि कहानी सिर्फ एक ताबूत की यात्रा नहीं है। यह एक देश की आस्था है। एक हुकूमत की चाल है और शायद एक नई जंग की शुरुआत भी। जनाजे से वॉर 2.0 की। आपको क्या लगता है? क्या यह जंग अब पूरी तरह भड़केगी या ट्रंप आखिरी वक्त पर फिर पलट कर कोई डील करेंगे? आप जो भी सोचते हैं कमेंट सेक्शन आपका इंतजार कर रहा है। इस वीडियो की जानकारियां अगर आपको अच्छी लगी हो तो हमारे चैनल से जुड़िएगा। हम कोशिश करते हैं कि ईमानदारी से निष्पक्षता के साथ हर विषय को आपके सामने रखें ताकि आप उस विषय की गहराई को समझें
