हरियाणा का इतिहास: 1857 की क्रांति से लेकर 1966 में राज्य निर्माण तक की पूरी कहानी

हरियाणा का इतिहास: 1857 की क्रांति से लेकर 1966 तक की कहानी
भारत के नक्शे पर आज हरियाणा उद्योग, खेल और विकास का प्रतीक है।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस राज्य की कहानी निर्माण से ज़्यादा त्याग, दर्द और उपेक्षा की कहानी है।
यह वही धरती है जिसे 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज़ों ने मिटा देने की सज़ा दी थी।
और फिर — 1966 में, इसका पुनर्जन्म हुआ — नाम था हरियाणा।
1857 की क्रांति — जब हरियाणा ने दिल्ली को संभाला
1857 की पहली क्रांति को इतिहास “भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम” कहता है,
लेकिन उसकी असली धड़कन दिल्ली नहीं, बल्कि हरियाणा की धरती थी।
दिल्ली को चारों ओर से घेरने वाले थे —
- बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह,
- झज्जर के नवाब अब्दुर रहमान,
- रेवाड़ी के राव तुला राम,
- फरुखनगर के नवाब अहमद अली,
- और दादरी के नवाब बहादुर खान।
इन वीरों ने दिल्ली को आज़ाद कराने की चिंगारी जलाई।
लेकिन अंग्रेज़ों ने चाल बदली — और कहानी बदल गई।
अंग्रेज़ों का कहर और हरियाणा की सज़ा
पूर्व IAS राम वर्मा अपनी किताब Three Lals of Haryana में लिखते हैं —
सितंबर 1857 में जब अंग्रेज़ों ने फिर से दिल्ली पर कब्जा किया,
तो उन्होंने हरियाणा की धरती पर कहर बरपा दिया।
राजा नाहर सिंह, झज्जर और दादरी के नवाबों को फांसी दे दी गई।
राव तुला राम को निर्वासन में काबुल भेज दिया गया।
हरियाणा की जनता को अंग्रेजों ने दोहरी सज़ा दी —
पहली, उनके वीरों को फांसी पर चढ़ा दिया गया।
दूसरी, उनके इलाकों को जींद, पटियाला और नाभा रियासतों को “इनाम” में दे दिया गया।
पंजाब का उत्थान और हरियाणा की उपेक्षा
अंग्रेजों ने पश्चिमी पंजाब में नहरों का जाल बिछा दिया,
वहीं हरियाणा की ज़मीन सूखती गई, बंजर होती गई।
यह इलाका जानबूझकर पिछड़ा रखा गया ताकि विद्रोह की चिंगारी फिर न उठे।
आज़ादी के बाद — एक नई बहस
1947 में देश तो आज़ाद हुआ,
पर पंजाब और हरियाणा के बीच भाषाई और धार्मिक तनाव बढ़ने लगा।
1953 में राज्यों के पुनर्गठन आयोग बना,
पर पंजाबी सूबे की मांग ठुकरा दी गई।
ज्ञानि करतार सिंह ने तब कहा था —
“संविधान में 14 भाषाएँ हैं,
उनमें से 13 के आधार पर राज्य बने,
लेकिन पंजाबी सूबा इसलिए नहीं बना क्योंकि सिखों की निष्ठा पर शक किया गया।”
1960 का दशक — जब हरियाणा ने अपनी आवाज़ बुलंद की
1961 में 49 विधायकों ने मुख्यमंत्री रामकिशन को ज्ञापन सौंपा —
जिसमें आरोप था कि पंजाब सरकार ने हिंदी भाषी इलाकों के साथ योजनाबद्ध भेदभाव किया है।
फ्रीडम फाइटर श्री राम शर्मा की हरियाणा डेवलपमेंट कमेटी ने
रिपोर्ट तैयार की —
जिसमें पाया गया कि सरकारी नौकरियों, बिजली, सिंचाई, शिक्षा —
हर क्षेत्र में हरियाणा पिछड़ा रखा गया।
1966 — हरियाणा का पुनर्जन्म
1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी ने
पंजाब-हरियाणा के मुद्दे को गंभीरता से लिया।
उन्होंने Punjab Boundary Commission बनाया,
और रिपोर्ट के आधार पर 1 नवंबर 1966 को
हरियाणा को एक अलग राज्य घोषित किया गया।
हालांकि चंडीगढ़ विवाद का केंद्र बना —
आयोग ने इसे हरियाणा का हिस्सा माना,
पर इंदिरा गांधी ने राजनीतिक समझौते के तहत इसे साझा राजधानी और केंद्र शासित प्रदेश बना दिया।
हरियाणा: संघर्ष से सफलता तक
हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा ने कहा था —
“अब हम अपनी ही ज़मीन पर किरायेदार बन गए हैं।”
लेकिन हरियाणा ने हार नहीं मानी।
न संसाधन, न उद्योग — फिर भी इस मिट्टी ने कमाल कर दिखाया।
कुछ ही सालों में हरियाणा ने खेती, उद्योग और खेलों में भारत को चौंका दिया।
2000 के बाद, हरियाणा ने राजस्व और विकास में पंजाब को भी पीछे छोड़ दिया।
👉 2023-24 में —
हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय ₹3.26 लाख
जबकि पंजाब की ₹1.96 लाख रही।
आज का हरियाणा — मेहनत और आत्मसम्मान का प्रतीक
आज हरियाणा IAS, IPS अधिकारियों की पसंदीदा पोस्टिंग है।
गुरुग्राम की ऊँचाई से लेकर जींद की मिट्टी तक —
हरियाणा की कहानी एक ही बात कहती है —
“संघर्ष हो या चुनौती, हरियाणा हमेशा आगे बढ़ता है।”
पंजाब-हरियाणा — दो शरीर, एक आत्मा
SYL नहर और चंडीगढ़ पर विवाद भले जारी हैं,
लेकिन दिलों का रिश्ता कभी नहीं टूटा।
2020 के किसान आंदोलन में,
2025 की बाढ़ में —
दोनों प्रदेश एक-दूसरे के साथ खड़े रहे।
राज्य भले दो हो गए हों,
पर जज़्बात आज भी एक हैं।
हरियाणा की कहानी सिर्फ़ एक राज्य की नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग और पुनर्जन्म की गाथा है।
1857 की क्रांति से लेकर 1 नवंबर 1966 तक — यह धरती बार-बार टूटी, फिर उठी, और आज भारत के सबसे सफल राज्यों में गिनी जाती है।
