दिल्ली ब्लास्ट के बाद फरीदाबाद के मुस्लिम बहुल गांव धौज में स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी जांच एजेंसियों के घेरे में है। यूनिवर्सिटी में कार्यरत दो डॉक्टरों की गिरफ्तारी के बाद इसके फंडिंग, प्रबंधन और कैंपस कल्चर पर सवाल उठने लगे हैं।
जांच एजेंसियों को शक है कि 70 एकड़ में फैली यूनिवर्सिटी शिक्षा के नाम पर रेडिकलाइजेशन का सेंटर बन गई है। यूनिवर्सिटी को अरब देशों से फंडिंग मिलती है, लेकिन FCRA रिकॉर्ड्स सार्वजनिक नहीं हैं।
कैंपस और मेडिकल सुविधाएँ
यूनिवर्सिटी में 800 बेड का सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल भी है, जहां मरीजों का मुफ्त इलाज होता है। संदेह है कि अस्पताल की लैब में विस्फोटक बनाने के लिए सामग्री का दुरुपयोग हुआ।
विवादित फैकल्टी
- चांसलर: जवाहर अहमद सिद्दीकी
- उपकुलपति: प्रो. भूपिंदर कौर आनंद
- गिरफ्तार डॉक्टर: डॉ. मुजम्मिल शकील, डॉ. शाहीन सईद, डॉ. उमर नबी
- डॉ. निसार-उल-हसन (J&K LG द्वारा 2023 में बर्खास्त)
जांच एजेंसी के अनुसार, कई डॉक्टर पहले विवादित NGO और इस्लामिक एजुकेशनल नेटवर्क से जुड़े रहे हैं। मेडिकल फैकल्टी में 20% डॉक्टर जम्मू-कश्मीर से हैं, जिनकी स्क्रीनिंग कमजोर पाई गई।

फंडिंग और रिकॉर्ड
अल फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट के तहत यूनिवर्सिटी संचालित है। FCRA पोर्टल पर पिछले 10 सालों के फाइनेंशियल फाइलिंग्स उपलब्ध नहीं हैं। अरब देशों से मिलने वाले दान और उनके स्रोतों की NIA जांच कर रही है।
शैक्षणिक पाठ्यक्रम और कैंपस कल्चर
- कोर्स: MBBS, MD/MS, BDS, B.Pharm, B.Tech, BA (English, Urdu, History, Journalism)
- लैब में कोई डिफेंस, बायो-केमिकल रिसर्च या एक्सप्लोसिव से संबंधित सामग्री नहीं है।
- कैंपस में सक्रिय इस्लामिक स्टूडेंट्स ग्रुप्स, सेमिनार और स्कॉलरशिप्स विदेशी छात्रों को आर्थिक समर्थन देती हैं।
यूनिवर्सिटी का बयान
- मेडिकल कॉलेज संचालन: 2019 से MBBS, 2023 से MD/MS।
- कैंपस में कोई रसायन या विस्फोटक सामग्री नहीं: केवल शैक्षणिक और प्रशिक्षण उपयोग के लिए लैब।
यूनिवर्सिटी का कहना है कि आरोपी डॉक्टरों से केवल प्रोफेशनल संबंध था और वे छात्रों के अकादमिक प्रशिक्षण तक ही सीमित थे।
