CJI बीआर गवई पर जूता फेंकने वाले एडवोकेट राकेश किशोर ने कहा कि उन्होंने भगवान विष्णु और सनातन धर्म का अपमान किया। 72 वर्षीय राकेश का कहना है कि वे खुद दलित हैं और सनातन के सम्मान के लिए खड़े हुए हैं। बार काउंसिल ने उनका लाइसेंस सस्पेंड कर दिया है।
गवई ने भगवान विष्णु का अपमान किया, मैं चुप नहीं रह सकता था’ — एडवोकेट राकेश किशोर

सुप्रीम कोर्ट में 6 अक्टूबर को उस वक्त हड़कंप मच गया जब वकील राकेश किशोर (72) ने CJI बीआर गवई की ओर जूता फेंकने की कोशिश की। हालांकि जूता उन तक नहीं पहुंचा, लेकिन इस घटना ने देशभर में बहस छेड़ दी।
अब एडवोकेट राकेश किशोर ने इस कदम के पीछे की अपनी सोच और नाराजगी साफ-साफ बताई है।
‘मुरादाबाद में डर के साए में जीना पड़ा’
राकेश किशोर ने कहा कि “90 के दशक में मेरी पत्नी मुरादाबाद की एक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थीं। वहां माहौल ऐसा था कि शाम के बाद औरतों को बाहर नहीं ले जा सकते थे। मुस्लिम इलाकों में अगर स्कूटर किसी की बकरी से छू भी जाता, तो मारपीट होती और औरतों को उठा लिया जाता।”
इस वाकये का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि तभी से उनके मन में एक नाराजगी रही है कि हिंदू समाज अपनी सुरक्षा और आस्था के मुद्दों पर चुप क्यों रहता है।
‘सनातन के अपमान पर मैं चुप नहीं रह सकता था’

राकेश कहते हैं, “16 सितंबर को जस्टिस गवई ने भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की बहाली वाली याचिका खारिज कर दी और कहा कि जाओ, भगवान से कहो कि वे खुद मूर्ति बना लें। ये टिप्पणी मुझे बहुत चोट पहुंचाने वाली थी।”
उन्होंने आगे कहा — “हिंसा पहले गवई साहब ने की, मैंने तो सिर्फ रिएक्शन दिया। जब सनातनियों का अपमान हुआ, तो मैं कैसे चुप रहता?”
‘हमारे घर की औरतें दरवाजे बंद कर लेती हैं’
अपने परिवार की नाराजगी पर उन्होंने कहा —
“मेरी पत्नी और बच्चे मुझसे नाराज हैं। लेकिन यही सनातन धर्म की कमजोरी है। मुस्लिम धर्म की महिलाएं अपने धर्म के लिए सड़कों पर उतरती हैं, जबकि हमारे घर की औरतें दरवाजा बंद कर लेती हैं।”
उन्होंने आगे कहा — “अगर सनातन का अपमान रोकना है तो विरोध करने वाले भी भगवा ध्वज लेकर सामने आने चाहिए।”
‘मैं खुद दलित हूं, लेकिन यह दलित बनाम सवर्ण का मामला नहीं’
जूता कांड के बाद कुछ लोगों ने इसे दलितों का मुद्दा बताया। इस पर राकेश बोले —
“मैं खुद कोरी समाज से हूं। यह दलित या सवर्ण का मुद्दा नहीं है, बल्कि सनातन धर्म के अपमान का सवाल है।”
उन्होंने कहा कि “आम आदमी पार्टी के लोग मेरे घर के बाहर जूतों की माला लेकर आए, लेकिन मेरी सोसाइटी का कोई व्यक्ति मेरे साथ खड़ा नहीं हुआ।”
‘सस्पेंशन से बड़ा नुकसान हुआ’
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने उनका लाइसेंस निलंबित कर दिया है।
राकेश कहते हैं —
“मेरे क्लाइंट केस और पैसा वापस ले रहे हैं। मेरे पास सबको लौटाने के लिए पैसे नहीं हैं। मैं हार्ट पेशेंट हूं, किडनी खराब है, लेकिन मैं मरने वाला नहीं हूं। भगवान ने मुझे कुछ बड़ा करने के लिए चुना है।”
‘प्रशांत भूषण को बरी किया गया, मुझे क्यों नहीं?’
उन्होंने सवाल उठाया —
“प्रशांत भूषण ने भी 2020 में चीफ जस्टिस पर टिप्पणी की थी। उन्हें सिर्फ एक रुपये का जुर्माना हुआ। जबकि मुझे बिना जांच के सस्पेंड कर दिया गया। क्या यही न्याय है?”
BCI की कार्रवाई
BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि एडवोकेट राकेश किशोर का व्यवहार “न्यायालय की गरिमा के अनुकूल नहीं” था।
आदेश में कहा गया कि “उन्हें किसी भी अदालत या प्राधिकरण में प्रैक्टिस करने से रोका जाए।”
वकालत से पहले WHO में काम करते थे
राकेश किशोर ने बताया कि उन्होंने WHO के वेक्टर जनित रोग प्रोजेक्ट्स में काम किया था और वे मेडिकल एंटोमोलॉजी एक्सपर्ट हैं। 2011 के बाद उन्होंने वकालत शुरू की थी।
CJI गवई का बयान
16 सितंबर को खजुराहो मंदिर की खंडित मूर्ति पर सुनवाई के दौरान CJI गवई ने कहा था कि “मूर्ति जैसी है, वैसी ही रहेगी। भक्त दूसरे मंदिर जाकर पूजा कर सकते हैं।”
18 सितंबर को उन्होंने सफाई दी थी कि उनके बयान को सोशल मीडिया पर गलत तरह से पेश किया गया है और वे “सभी धर्मों का सम्मान करते हैं।”
