1977 से 1980 के बीच बिहार के भागलपुर में घटा एक ऐसा कांड जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। पुलिस ने अपराधियों से पूछताछ के नाम पर उनकी आंखें फोड़ डालीं, फिर उन पर तेजाब उड़ेल दिया ताकि वे दोबारा कभी देख न सकें। इसे ही बाद में ‘भागलपुर आंखफोड़वा कांड’ या ‘ऑपरेशन गंगाजल’ कहा गया। यह भारतीय पुलिस इतिहास का सबसे भयावह अध्याय था, जिसने इंसानियत और कानून दोनों को शर्मसार कर दिया।

अपराध की शुरुआत: अनिल की कहानी
1977 की सर्द सुबह थी। 26 वर्षीय अनिल खेत में मिट्टी मलते हुए सोच रहा था कि खेती से घर कैसे चलेगा। तभी सामने सुदामा मंडल नाम का कुख्यात अपराधी आया और अनिल से कहा—
“चल हमारे साथ… डॉन बनेगा तू। पैसा, इज्जत सब मिलेगा।”
उस दिन अनिल ने अपराध की दुनिया में कदम रख दिया। जल्द ही वह हत्या, डकैती और बलात्कार जैसे मामलों में वांछित बन गया।

पुलिस की गिरफ्त और अत्याचार
5 जुलाई 1980 की रात अनिल को भागलपुर पुलिस ने पकड़ लिया। थानेदार मोहम्मद वसीमुद्दीन ने बिना पूछताछ किए उस पर हंटर बरसाए। जब भी अनिल कुछ न बोलता, पुलिस उसका और भी बेरहमी से टॉर्चर करती।
7 जुलाई की रात, थाने में वसीमुद्दीन ने अनिल की दोनों आंखों में सूजा (लोहे की नुकीली सुई) घोंप दी और फिर तेजाब डाल दिया। यह वही दिन था जब “ऑपरेशन गंगाजल” की शुरुआत हुई।

‘गंगाजल’ यानी तेजाब से धोना पाप
थाने में कुल 9 अपराधियों की आंखें इसी तरह फोड़ी गईं।
जब किसी ने पूछा — “गंगाजल क्यों?”
तो पुलिस बोली — “इन्हें तेजाब से धो देंगे, पाप धुल जाएगा।”
पुलिसवालों को यह यकीन हो गया कि अब अपराधी थरथर कांपेंगे। इसी सोच के साथ भागलपुर और आसपास के थानों में यह तरीका अपनाया जाने लगा।
पुलिस की बर्बरता का सच छिपाने की कोशिश
पुलिस ने डॉक्टरों को बुलाया ताकि दिखावा किया जा सके कि वे इलाज करा रहे हैं। असल में डॉक्टरों को कहा गया कि इलाज नहीं करना है, बस पट्टी बांध देनी है।
जिन कैदियों को हल्का-हल्का दिखने लगा था, उनकी आंखों में दोबारा सूजा घोंपा गया और तेजाब डाला गया।
1979 से 1980 के बीच कम से कम 34 कैदियों को अंधा कर दिया गया।
न्यूज़ एजेंसी UNI के मुताबिक यह संख्या 87 तक पहुंच गई थी।
पत्रकारिता ने खोला राज
इंडियन एक्सप्रेस के सीनियर पत्रकार अरुण सिन्हा ने 22 नवंबर 1980 को यह पूरा सच सामने लाया।
हेडलाइन थी —
“Eyes punctured twice to ensure blindness”
(आंखों को दो बार फोड़ा गया ताकि अंधापन पक्का हो जाए)।
खबर छपते ही पूरे देश में हड़कंप मच गया
सरकार का रुख और जनता की सोच
मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने पहले तो इसे नकारा, बाद में कहा —
“मैं नैतिक जिम्मेदारी लेता हूं, पर इस्तीफा क्यों दूं? जनता तो खुश है।”
अजीब स्थिति यह थी कि उस समय आम जनता पुलिस का समर्थन कर रही थी। “पुलिस जनता भाई-भाई” के नारे लग रहे थे।
आरोपियों का प्रमोशन और राजनीति
आंखफोड़वा कांड के 15 आरोपी पुलिसवालों को पहले सस्पेंड किया गया, लेकिन 2 साल बाद सभी बहाल हो गए और प्रमोशन भी मिला।
सबौर थाने के एसपी विष्णु दयाल राम बाद में झारखंड के डीजीपी बने और फिर बीजेपी सांसद।
यह भारत की न्याय व्यवस्था पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न था।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
1980 से 1983 तक सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चली।
अदालत ने कहा —
“जो कुछ हुआ, उसके लिए पुलिस जिम्मेदार है।”
तीन पुलिसवालों — मोहम्मद वसीमुद्दीन, मानकेश्वर सिंह, और बिंदा प्रसाद — को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
साथ ही, पीड़ितों को हर महीने ₹500 का मुआवजा देने का आदेश हुआ, जिसे बाद में ₹750 कर दिया गया।
आखिरी पन्ना
40 साल बीत चुके हैं, लेकिन भागलपुर आंखफोड़वा कांड भारत की पुलिसिया मानसिकता पर एक काला धब्बा बनकर आज भी दर्ज है।
यह सिर्फ अपराधियों की कहानी नहीं थी, यह राज्य की क्रूरता बनाम इंसानियत की लड़ाई थी — जिसमें कानून हार गया और इंसानियत रो पड़ी।
